ओशो– कुरान अत्यंत सीधे-सादे हृदय का वक्तव्य है। उपनिषद, धम्मपद, गीता, ताओत्तेह-किंग, इन सब में एक परिष्कार है। क्योंकि बुद्ध परम सुशिक्षित, सुसंस्कृत राजघर से आए थे। मोहम्मद बेपढ़े-लिखे थे।कृष्ण जब कुछ कहते हैं, तो उस कहने में तर्क होता है, विचार की प्रक्रिया होती है, एक गणित होता है। मोहम्मद के वक्तव्य अत्यंत सरल हैं। जैसे खदान से निकाला गया ताजात्ताजा हीरा। अभी उस पर जौहरी की छैनी नहीं चली। अभी उस पर पालिश नहीं किया गया। अभी उस पर पहलू नहीं निखारे गए।
इससे एक तो लाभ है और एक हानि भी। और इस्लाम को दोनों ही बातें अनुभव करनी पड़ी हैं। लाभ तो यह है कि जैसे ग्रामीण व्यक्ति की भाषा में एक बल होता है,ताजगी होती है, धार होती है, क्योंकि बात सीधी-साफ होती है,समझाने की कोई जरूरत नहीं होती। इसलिए कुरान पर टीकाएं नहीं लिखी गईं। बात सीधी-साफ है। टीका करने का कोई उपाय नहीं है। गीता पर हजारों टीकाएं हैं।–तो हजारों अर्थ हो गए–क्योंकि बात दुरूह है। अभिव्यक्ति का ढंग ऐसा है कि उससे बहुत अर्थ अभिव्यंजित हो सकते हैं। एक-एक शब्द से अनेक-अनेक अर्थों की संभावना है। तो बाल की खाल खींची जा सकती है।तर्कशास्त्री के हाथ में पड़ कर गीता का सत्य खो जाएगा, बुद्ध का सत्य खो जाएगा, कुरान का सत्य नहीं खोएगा। क्योंकि कुरान के साथ तर्क का कोई संबंध नहीं बैठता। कुरान को जिन्हें समझना है, उन्हें तर्क से नहीं, अत्यंत सरलता से कुरान के पास पहुंचना होगा। यह तो लाभ है।
लेकिन हानि भी है। हानि यह है, कि चूंकि वक्तव्य बहुत सीधे-सादे हैं, उनमें गहराई दिखाई न पड़ेगी, उनमें ऊंचाई दिखाई न पड़ेगी, उनमें बहुत आयाम दिखाई न पड़ेंगे,साधारण मालूम होंगे। इसलिए उपनिषद की तुलना में कुरान के वचन साधारण मालूम होंगे। कहां उपनिषद, उपनिषद के ऋषि की प्रार्थना: असतो मा सदगमय, असत्य से मुझे सत्य की ओर ले चल, हे प्रभु; तमसो मा ज्योतिर्गमय, अंधकार से उठा मुझे प्रकाश के लोक में; मृत्योर्माऽमतं गमय, और कब तक मृत्यु में जीऊं, अमृत के द्वार खोल! हटा दे यह स्वर्ण के पात्र से सारे ढक्कन! उठा दे घूंघट कि मैं देख लूं अमृत को! इसमें गहराई खोजी जा सकती है। बहुत गहराई खोजी जा सकती है!कुरान में भी गहराई इतनी ही है, जरा भी कम नहीं, मगर वक्तव्य मोहम्मद के सीधे-सादे हैं। मोहम्मद गैर पढ़े-लिखे आदमी हैं। न लिख सकते थे, न पढ़ सकते थे। इसलिए जब कुरान की आयतें पहली बार उन पर उतरनी शुरू हुईं तो वे बहुत घबड़ा गए। भीतर कोई हृदय में जोर से कहने लगा: लिख! और मोहम्मद ने कहा कि मैं लिखना जानता नहीं, लिखूं कैसे? गा, भीतर से कोई आवाज आने लगी। और मोहम्मद ने कहा, मैं क्या गाऊंगा! न मेरे पास कंठ है, न गीत की कोई कला है, मैं बिलकुल बेपढ़ा-लिखा आदमी हूं, क्या गाऊं, क्या लिखूं? कैसे गाऊं? वे इतने घबड़ा गए कि घर भागे आ गए;पहाड़ पर बैठे थे मौन में–मौन में ही यह परम घटना घटती है कि सत्य अवतरित होता है।..बुद्ध को भी जब सत्य की अभिव्यक्ति हुई तो कथा है–वह कथा तो प्रतीकात्मक है कि कोई भीतर बोला कि बोल, गा,गुनगुना–ऐसे ही बुद्ध से देवताओं ने अवतरित होकर स्वर्ग से कहा: अभिव्यक्ति दो, बांटो, कहो, चुप न रह जाओ! बुद्ध ने भी कारण बताए कि क्यों चुप हूं। लेकिन कारण बड़े अलग थे। उससे दो व्यक्तित्वों का भेद पता चलता है। बुद्ध ने कहा: बोलूंगा;कौन समझेगा?
फर्क समझना।
मोहम्मद ने कहा: कैसे बोलूं, मेरी समझ क्या? बुद्ध ने कहा: कहूंगा, मगर कौन समझेगा? यह बात इतनी गहरी है! किससे कहूं? मोहम्मद ने कहा: कैसे कहूं? बुद्ध ने कहा: किससे कहूं? जिससे कहूंगा वही कुछ का कुछ समझेगा। गलत समझेगा। सौ आदमियों से कहूंगा, निन्यानबे तो समझेंगे ही नहीं, सुनेंगे ही नहीं, सुन भी लिया तो गलत समझेंगे, लाभ के बजाय हानि होगी। और सौवां आदमी, एक आदमी सौ में अगर ठीक भी समझा तो उसके लिए मुझे कहने की जरूरत नहीं है।
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३
दीपक बारा नाम का-(प्रश्नोत्तर) प्रवचन- ०५ अल्लाह बेनियाज़ है