तिलक (टीका) लगाने का अद्भुत रहस्य….. क्रमशः7……

ओशो- सोचेंगे आप, तिलक के संबंध में मैं यह क्यों कह रहा हूं?
हर बच्चे के माथे पर तिलक लगा दिया, जब कि उसे कुछ पता नहीं है। कभी उसे पता होगा, कभी उसे पता चलेगा, तब वह इस तिलक के राज को समझ पाएगा। इशारा कर दिया गया है किसी जगह का, ठीक जगह पर निशान बना दिया गया है। कभी जब उसकी चेतना इतनी समर्थ होगी, तब वह इस निशान का उपयोग कर पाएगा। कोई फिकर नहीं, सौ आदमियों पर लगाया गया निशान, और निन्यानबे के लिए काम नहीं पड़ा। कोई फिकर नहीं, एक को भी काम पड़ जाए तो कम नहीं है। इस आशा में सौ पर लगा दिया गया है कि कभी किसी क्षण में, कभी किसी क्षण में, उसका स्मरण आ जाएगा तो पता चल जाएगा।
तिलक के लिए इतना मूल्य, इतना सम्मान कि जब भी कुछ विशेष घटना हो, शादी हो रही हो तो तिलक हो, कोई जीत कर लौट आए तो तिलक हो! कभी आपने सोचा कि हर सम्मान की घटना के साथ तिलक, यह सिर्फ लॉ ऑफ एसोसिएशन का उपयोग है। क्योंकि हमारे चित्त में एक बड़े मजे का मामला है। हमारा चित्त दुख को भूलना चाहता है और सुख को याद रखना चाहता है। हमारा चित्त लंबे अर्से में दुख को भूल जाता है और सुख को याद रखता है।
इसीलिए तो हमें पीछे के दिन अच्छे मालूम पड़ते हैं। बूढ़ा कहता है, बचपन बहुत सुखद था। कोई और बात नहीं है, दुख को ड्राप कर देता है मन हमारा, सुख की श्रृंखला को कायम रखता है। जब लौट कर पीछे देखता है तो सुख ही सुख दिखाई पड़ता है। बीच-बीच में जो दुख थे, उनको हम गिरा आए रास्ते में। कोई बच्चा नहीं कहता कि बचपन सुखद है। बच्चे जल्दी से जल्दी बड़े होना चाहते हैं। और सब बूढ़े कहते हैं बचपन बहुत सुखद है।
जरूर कहीं न कहीं कोई भूल हो रही है। अब ये जितने बच्चे हैं, उनको खड़े करके पूछो कि तुम क्या होना चाहते हो? वे कहेंगे, हम बड़े होना चाहते हैं। और जितने बूढ़े हैं, उनसे पूछो, क्या होना चाहते हो? वे कहेंगे, हम बच्चे होना चाहते हैं। मगर एक बच्चा गवाही नहीं देता तुम्हारे साथ। बच्चा जितने जल्दी बड़ा हो जाए! इसलिए कई दफे तो वह ऐसी कोशिश करता है बड़े होने की कि जिसका कोई हिसाब नहीं। सिगरेट पीने लगता है, इसलिए कि वह देखता है कि सिगरेट जो है सिंबॉलिक है बड़े आदमी का। कोई और कारण से नहीं। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि बच्चों में सौ में से सत्तर प्रतिशत बच्चे इसलिए सिगरेट पीते हैं कि सिगरेट जो है प्रेस्टिज का प्रतीक है। उसको ताकतवर, बड़े लोग, प्रतिष्ठा वाले लोग पीते हैं। वह भी पीकर धुआं जब उड़ाता है, तो भीतर उसकी रीढ़ सीधी हो जाती है–मैं भी कुछ हूं, समबडी। उसको मालूम पड़ता है कि मैं भी कोई ऐसा-वैसा नहीं हूं।
किसी फिल्म पर लिख दें कि इसको सिर्फ अडल्ट देख सकते हैं। बच्चे सब नकली मूंछ लगा कर फिल्म के भीतर प्रवेश कर जाते हैं। क्यों? बड़ा होने की बड़ी तीव्र आकांक्षा है, जल्दी। मगर सब बूढ़े कहते हैं कि बचपन बड़ा सुखद था। कहीं कोई बात हो रही है। बात कुल इतनी ही है कि मन दुख को भुला देता है, गिरा देता है। दुख याद रखने जैसी चीज भी नहीं है।
एक बहुत हैरानी का सूत्र पियागेट नाम के मनोवैज्ञानिक ने बताया, जिसने चालीस साल तक बच्चों पर मेहनत की है। उसका कहना है कि पांच साल से पहले की किसी बच्चे को स्मृति नहीं रहती बाद में, उसका कुल कारण यह है कि पांच साल की जिंदगी इतनी दुखद है कि उसको याद नहीं रखा जा सकता। यह हम सोच न सकेंगे! पर पियागेट ठीक कहता है, अनुभव से कहता है, भारी अनुभव से कहता है।
आपको अगर कहा जाए कि आपको कब तक की याद है? तो आप ज्यादा से ज्यादा पांच साल, चार साल लौट पाते हैं। फिर क्यों नहीं लौटते पीछे और? क्या उस वक्त मेमोरी नहीं बनती थी? बनती थी। क्या उस वक्त घटना नहीं घटती थीं? घटती थीं। क्या उस वक्त किसी ने गाली नहीं दी और किसी ने प्रेम नहीं किया? सब हुआ है। पर मामला क्या है? चार साल के पहले की स्मृति का कोई रिकॉर्ड क्यों नहीं है आपके पास?
पियागेट कहता है कि वे दिन इतने दुख में बीतते हैं, क्योंकि बच्चा अपने को इतना दीन, इतना कमजोर, इतना हीन, सबसे दबा हुआ, इतना असहाय अनुभव करता है कि उसका कुछ भी याद रखना उसको पसंद नहीं है। वह उसको ड्राप कर देता है, भूल ही जाता है। वह कहता है, चार साल से पहले का तो मुझे कुछ याद ही नहीं है। कुछ याद नहीं है, क्योंकि बाप ने कहा बैठ, तो उसको बैठना पड़ा था। मां ने कहा उठो, तो उसको उठना पड़ा था। सब बड़े थे, बड़े शक्तिशाली थे, उसकी अपनी कोई सामर्थ्य न थी, वह बिलकुल हवा में उड़ता हुआ पत्ता जैसा था। जो कोई कुछ कह दे, सब पर निर्भर था। जरा सी आंख का इशारा और उसको डर जाना पड़ेगा, उसके हाथ में कुछ भी सामर्थ्य न थी। उसने उसको बंद कर दिया, वह खयाल ही छोड़ दिया कि मैं कभी था ऐसा, बात खत्म हो गई। वह चार साल के पहले की याद ही नहीं करता। मजे की बात है–हिप्नोटाइज करके आपको याद करवाई जा सकती है! चार साल के पहले की ही नहीं, मां के पेट में भी जब आप थे, तब की भी स्मृति बनती है। अगर मां गिर पड़ी हो आपकी, तो बच्चे को उसके पेट में स्मृति बनती है कि चोट पहुंची, वह भी याद करवाई जा सकती है। लेकिन साधारणतः होश में नहीं रहती।
तो इस तिलक को सुख के साथ जोड़ने का उपाय कारण पूर्वक है। जब भी सुख की कोई घटना घटे, तिलक कर दो। सुख याद रहेगा, साथ में तिलक भी याद रह जाएगा। और धीरे-धीरे सुख अगर तीसरी आंख से संयुक्त हो जाए–यह लॉ ऑफ एसोसिएशन को थोड़ा समझ लें।
पावलफ ने बहुत से प्रयोग किए। इस सदी में रूसी वैज्ञानिक पावलफ एसोसिएशन के ऊपर सर्वाधिक काम किया है। उसका कहना है, कोई भी चीज जोड़ी जा सकती है, सब जोड़ सहयोग के हैं। जैसे उसका प्रयोग सबको पता है, तो वह एक कुत्ते को खाना देगा, तो रोटी सामने रखेगा तो लार टपकेगी। तभी वह घंटी बजाता रहेगा। अब घंटी से लार टपकने का कोई भी संबंध नहीं है। कितनी ही घंटी बजाइए, लार कैसे टपकेगी कुत्ते की? लेकिन रोटी रखी, लार टपकी, तब घंटी बजाई। पंद्रह दिन वह रोटी के साथ घंटी बजेगी, सोलहवें दिन रोटी तो हटा ली, सिर्फ घंटी बजाई–लार टपकने लगी। क्या हुआ क्या कुत्ते को? घंटी से लार का कोई भी नैसर्गिक संबंध नहीं है। लेकिन अब संबंध जुड़ गया। रोटी के साथ घंटी एक हो गई, घंटी का बजना रोटी की याद बन गई। रोटी की याद, चक्र शुरू हो गया उसके मन में रोटी का, लार टपकनी शुरू हो गई। घंटी प्रतीक की तरह आ गई, वह रोटी का सिंबल हो गई।
इस कानून का उपयोग तिलक में किया गया है। आपके सुख के साथ तिलक को सदा जोड़ा। जब भी सुख की कोई घटना घटी, तिलक–तिलक और सुख को एक किया। धीरे-धीरे तिलक और सुख इतने एक हो जाएं कि तिलक को कभी भूला न जा सके–एक। वह आपके स्मरण में टंक जाए, बैठ जाए; और जब भी सुख की याद आए, तब आज्ञाचक्र की याद आए। जब भी सुख की याद आए, तब जो पहली याद आए वह आज्ञाचक्र की याद आए।
और सुख की हमें बहुत याद आती है। सुख में ही तो हम, चाहे हुआ हो या न हुआ हो, उसकी याद में तो जीते हैं। जितना होता है उससे ज्यादा बड़ा करके याद करते रहते हैं पीछे-पीछे। फिर धीरे-धीरे तो उसको इतना बड़ा कर लेते हैं कि जिसका कोई हिसाब नहीं। सुख को हम बड़ा करते रहते हैं, मैग्नीफाई करते रहते हैं। दुख को छोटा करते रहते हैं, एक ही नियम के अनुसार। सुख को बड़ा करते रहते हैं।
आपकी प्रेयसी मिली थी, कितना सुख आया था? आज सोचेंगे तो बहुत बड़ा मालूम पड़ेगा। अभी मिल जाए तो पता चले! एकदम छोटा हो जाएगा, सिकुड़ जाएगा। और कल हो सकता है फिर चौबीस घंटे बाद आप मैग्नीफाई करें कि अहा, कितना आनंद था!
वह पीछे हमारा मन सुख को बड़ा करता जाता है। असल में इतना दुख है जीवन में कि अगर हम सुख को बड़ा न कर पाएं तो जीना बहुत मुश्किल है। उसको बड़ा करके, रस ले-ले कर चलाते हैं। इधर पीछे बड़ा कर लेते हैं, उधर आगे आशा में बड़ा कर लेते हैं, और चलते हैं।
तिलक के साथ सुख को जोड़ने का प्रयोजन है कि जब सुख बड़ा हो तो तिलक भी बड़ा हो जाए। और जब सुख की याद आए तो तिलक की भी याद आए। और यह चोट जो है याद की, धीरे-धीरे सुख आज्ञाचक्र से जुड़ जाए, कि जब भी जीवन में सुख आए तो आज्ञाचक्र का स्मरण आए। और यह हो जाता है। और जब यह हो जाता है तो आपने सुख का उपयोग किया तीसरी आंख को जगाने के लिए। सब सुख की स्मृतियां आज्ञा के चक्र से जुड़ गईं। अब यह हम सुख की धारा का उपयोग कर रहे हैं उसको चोट करने के लिए। यह चोट जितने मार्गों से पड़ सके उतना उपयोगी है।
जिन मुल्कों में तिलक का उपयोग नहीं हुआ वे वे ही मुल्क हैं जिनको थर्ड आई का कोई पता नहीं है, यह आपको खयाल होना चाहिए। जिन-जिन मुल्कों को तीसरी आंख का थोड़ा भी अनुमान हुआ, उन्होंने तिलक का उपयोग किया। जिन मुल्कों को कोई पता नहीं है, वे तिलक नहीं खोज पाए। तिलक खोजने का कोई आधार नहीं था। समझ लें थोड़ा। यह आकस्मिक नहीं है कि कोई समाज एकदम से उठ आए और एक टीका लगा कर बैठ जाए। पागल नहीं है। अकारण, माथे के इस बीच के बिंदु पर ही तिलक लगाने की सूझ का कोई कारण भी तो नहीं है, यह कहीं और भी तो लगाया जा सकता था। आकस्मिक नहीं हो सकता, उसके पीछे कारण हो तो टिक सकता है।
और भी आपको दो-तीन बातें इस संबंध में कहूं। एक, आपने कभी खयाल न किया होगा, जब भी आप चिंता में होते हैं तब आपकी तीसरी आंख पर जोर पड़ता है, इसीलिए माथा पूरा का पूरा सिकुड़ता है। उसी जगह जोर पड़ता है, जहां तिलक है। बहुत चिंता करने वाले, बहुत विचार करने वाले लोग, बहुत मननशील लोग, अनिवार्य रूप से माथे पर बल डाल कर उस जगह की खबर देते हैं।
और जिन लोगों ने, जैसा मैंने पीछे कहा, जिन लोगों ने पिछले जन्मों में कुछ भी तीसरी आंख पर जोर किया है, उनके जन्म के साथ ही उनके माथे पर अगर आप हाथ फिराएं तो आपको तिलक की प्रतीति होगी। उतना हिस्सा थोड़ा सा धंसा हुआ होगा–थोड़ा सा, किंचित, ठीक तिलक जैसा धंसा हुआ होगा। दोनों तरफ के हिस्से थोड़े उभरे हुए होंगे, ठीक उस जगह पर जहां पिछले जन्मों में मेहनत की गई है वहां थोड़ा सा हिस्सा धंसा हुआ होगा। और वह आप अंगुली-अंगूठा लगा कर भी, आंख बंद करके भी पहचान सकते हैं। वह जगह आपको अलग मालूम पड़ जाएगी। तिलक हो या टीका–टीका उसका ही विशेष उपयोग है तिलक का–लेकिन दोनों के पीछे तीसरी आंख छिपी हुई है।
हिप्नोटिस्ट एक छोटा सा प्रयोग करते हैं। चारकाट फ्रांस में एक बहुत बड़ा मनस्विद हुआ, जिसने इस बात पर बहुत काम किए। आप भी छोटा सा प्रयोग करेंगे तो आपको चारकाट की बात खयाल में आ जाएगी। अगर आप किसी के सामने उसके माथे पर दोनों आंखें गड़ा कर देखें, तब तो वह आदमी आपको गड़ाने न देगा। अगर आप किसी के माथे पर दोनों आंखें गड़ा कर देखें तो वह आदमी जितना क्रुद्ध होगा उतना किसी और चीज से नहीं हो सकता। इसलिए वह तो अशिष्ट व्यवहार है, वह तो आप कर नहीं पाएंगे। पर सामने से तो बहुत निकट है वह, सिर्फ डेढ़ इंच के फासले पर है, अगर आप किसी के माथे पर पीछे से भी दृष्टि रखें तो भी आप हैरान हो जाएंगे।
रास्ते पर आप चल रहे हैं, और कोई आदमी आपके आगे चल रहा है। आप ठीक जहां माथे पर यह बिंदु है तिलक का, ठीक इसके आर-पार अगर हम एक छेद करें तो पीछे जहां से छेद निकलता हुआ मालूम पड़ेगा, अनुमान करके उस जगह दोनों आंखें गड़ा दें। और आप कुछ ही सेकेंड आंख गड़ा पाएंगे कि वह आदमी लौट कर आपको देखेगा।
सिर्फ होटल के बैरे भर नहीं देखेंगे। उन पर भर आप प्रयोग मत करना किसी होटल में बैठ कर। उसका कारण है। सिर्फ वे लोग नहीं देखेंगे–जैसे मैंने होटल के बैरे का आपको कहा, वह जान कर कहा ताकि आपको खयाल में आ जाए। होटल का बैरा भर, आप कितना ही उसके पीछे माथे पर आंखें गड़ाएं, नहीं देखेगा। क्योंकि वह पूरे वक्त ग्राहकों से बचने की कोशिश में है। जैसे ही उसको पता चल जाए कि कोई उसमें उत्सुक है, वह और ज्यादा दूसरी टेबलों के आस-पास चक्कर मारने लगता है। इसलिए वह भर आपको नहीं देखेगा, बाकी कोई भी देखेगा।
अगर आप ठीक से थोड़े दिन अभ्यास करें और उस आदमी को सुझाव दें तो सुझाव भी वह आदमी मानेगा। समझ लें कि किसी आदमी के माथे के पीछे आप देखते हैं गड़ा कर आंख, पलक नहीं झपें, कुछ सेकेंड बिना पलक झपे देखते रहें, वह आदमी पीछे लौट कर देखेगा। अगर वह आदमी लौट कर देखता है तब आप उसको आज्ञा भी दे सकते हैं। फिर दुबारा उस आदमी को आप कहें, बाएं घूम जाओ! तो वह आदमी बाएं घूमेगा, और बड़ी बेचैनी अनुभव करेगा। हो सकता है उसको दाएं जाना हो! यह आप थोड़ा प्रयोग करके देखेंगे तो हैरान हो जाएंगे।
मगर यह तो पीछे से, जहां से कि फासला बहुत ज्यादा है। सामने से तो बहुत हैरानी के परिणाम होते हैं। बहुत हैरानी के परिणाम होते हैं। जितने लोग भी हलके किस्म का शक्तिपात करते रहते हैं वह आपके इसी चक्र के कारण, और कुछ कारण नहीं होता। कोई साधु, कोई संन्यासी अगर शक्तिपात के प्रयोग करते रहते हैं लोगों पर, तो वह यही कि आपको आंख बंद करके सामने बिठा लिया है। आप समझ रहे हैं वह कुछ कर रहे हैं। वह कुछ नहीं कर रहे हैं। वह सिर्फ आपके माथे के इस बिंदु पर दोनों आंखें गड़ा कर बैठे हैं। लेकिन आप तो आंख बंद किए बैठे हैं। और इस बिंदु पर जो भी आपको सुझाव दिया जाएगा, वह आपको भ्रांति प्रतीति फौरन हो जाएगी। अगर कहा जाए कि भीतर प्रकाश ही प्रकाश है! आपके भीतर प्रकाश ही प्रकाश हो जाएगा। बाकी इधर से आप गए कि वह विदा हो जाएगा। दो-चार दिन उसकी हलकी झलक रह सकती है, फिर समाप्त हो जाएगा। वह कोई शक्तिपात वगैरह नहीं है, वह सिर्फ आपके आज्ञाचक्र का थोड़ा सा उपयोग है।
यह तृतीय नेत्र की अनूठी संपदा है, और अपरिसीम उपयोग हैं। उसके लिए सिर्फ सिंबॉलिक तिलक है। जब यहां दक्षिण में पहली दफा ईसाई फकीर आए तो कुछ ईसाई फकीरों ने तो आकर तिलक लगाना शुरू कर दिया। आज से एक हजार साल पहले वेटिकन की अदालत में मुकदमे की हालत आ गई। क्योंकि यहां जिन ईसाई फकीरों को भेजा था, उन्होंने यहां आकर जनेऊ भी पहन लिया, और तिलक भी लगाया, और खड़ाऊं भी डाल ली, और वे हिंदू संन्यासी की तरह रहने लगे। तो वेटिकन की अदालत तक मामला गया वह कि यह तो बात गलत है। तो जिन फकीरों ने यह किया था, उन्होंने उत्तर दिए। उन्होंने कहा कि यह गलत नहीं है। यह तिलक लगाने से हम हिंदू नहीं हो रहे हैं। यह तिलक लगाने से तो हमें सिर्फ एक रहस्य का पता चला है, जिसका आपको पता नहीं था। इस खड़ाऊं को पहन कर हम हिंदू नहीं हो रहे हैं। यह तो हमें पहली दफे हिंदुओं की समझ का पता चला है कि ध्यान करते वक्त अगर लकड़ी पैर के नीचे हो, तो बिना लकड़ी के जो काम महीनों में होगा, वह लकड़ी के साथ दिनों में हो सकता है। हम हिंदू नहीं हो गए हैं, लेकिन अगर हिंदू कुछ जानते हैं तो हम नासमझ होंगे कि हम उसका उपयोग न करें।
सारा विकास पुरानी पीढ़ी के द्वारा नई पीढ़ी को अपना संचित अनुभव देने में निर्भर है। तो सोचें, बीस साल के लिए बूढ़े तय कर लें कि हम बच्चों को कुछ न बताएंगे। तो आप समझते हैं, बीस साल का नुकसान नहीं होगा, बीस हजार साल में जो इकट्ठा हुआ है उसका नुकसान हो जाएगा। अगर बीस साल के लिए बूढ़े तय कर लें, पिछली पीढ़ी तय कर ले कि नई पीढ़ी को अब कुछ नहीं बताना है। तो आप यह मत सोचना कि यह बीस साल का ही नुकसान होगा और इसको बीस साल में पूरा किया जा सकेगा। नहीं, बीस साल में जो नुकसान होगा उसको पूरा करने में बीस हजार साल लगेंगे। क्योंकि गैप खड़ा हो गया, पुरानी पीढ़ियों का सबका सब डूब जाएगा।
इन दो सौ साल में भारत के लिए भारी गैप पैदा हुआ। जिसमें उसकी जो भी जानकारी थी उससे उसके सारे संबंध टूट गए। और उसके सारे संबंध एक नई जानकारी से जोड़े गए जिसका पुरानी जानकारी से कोई संबंध नहीं था। तो हम सोचते ही हैं आज कि हम बहुत पुरानी कौम हैं। सच बात यह है कि अब हम दो सौ साल से ज्यादा पुरानी कौम नहीं हैं–अब। हमसे अंग्रेज ज्यादा पुराने हैं अब। अब हमारे पास जो जानकारी है वह कचरा है, उच्छिष्ट। वह भी जो पश्चिम हमको दे दे वह हमारी जानकारी है। दो सौ साल के पहले हम जो भी जानते थे वह सबका सब एकबारगी खो गया। और जब कोई चीज के सूत्र खो जाएं तो मूढ़ता मालूम पड़ने लगती है।
अब अगर आप ऐसे टीका लगा कर जाएं तो शर्म लगती है। कोई भी पूछ ले कि क्या किया? ये कैसे टीका लगाए हुए हो? तो ऐसे ही, कुछ नहीं, पिताजी नहीं माने, या क्या किया जाए बस ठीक है, किसी तरह चलाना पड़ता है! आज आनंद और प्रफुल्लता से टीका लगाना बहुत मुश्किल है। हां, बुद्धि बिलकुल न हो तो लगा सकते हैं, फिर तो कोई डर ही नहीं है। पर उसका भी कारण यह नहीं है कि आपको पता है इसलिए लगा रहे हैं।
ज्ञान के सूत्र जब गिर जाते हैं और उनका ऊपरी ढांचा रह जाता है तो ढोना बड़ा कठिन हो जाता है। और तब एक दुर्घटना घटती है कि जो सबसे कम बुद्धिमान होते हैं, वे उसको ढोते हैं; और जो बुद्धिमान होते हैं, दूर खड़े हो जाते हैं। एक दुर्घटना घटती है! जब कि बुद्धिमान ही जब तक किसी चीज को लेकर चलता है, तभी तक वह सार्थक रहती है। और यह बड़े मजे की बात है कि जब भी दुर्घटना घटती है और ज्ञान के सूत्र खोते हैं तो बुद्धिमान सबसे पहले छंट कर अलग हो जाते हैं, क्योंकि वे बुद्धू बनने के लिए राजी नहीं हैं। हां, जो बुद्धू है वह जारी रखता है। मगर वह बचा नहीं सकता। उसका कोई उपाय नहीं है। वह कुछ दिन खींचेगा और समाप्त हो जाएगा।
तो कई बार ऐसी घटना घटती है कि बड़ी कीमत की चीजें, जो नासमझ हैं वे बचाए रखते हैं, और जो समझदार हैं पहले छोड़ कर खड़े हो जाते हैं। जिंदगी में बड़े दांव-पेंच हैं। अगर ठीक से हमें भारत का यह दो सौ साल का जो अंतराल पड़ गया है वह पूरा करना हो, तो भारत में आज जो-जो काम बुद्धिहीन कर रहे हैं उसको वापस सोचने की जरूरत है–एक-एक बिंदु को। क्योंकि वे अकारण नहीं कर रहे हैं, उनके साथ बीस हजार साल की लंबी घटना है। वे नहीं बता सकते कि क्यों कर रहे हैं। इसलिए उन पर नाराज होने की कोई जरूरत नहीं है। किसी दिन हमको उन्हें धन्यवाद भी देना पड़ सकता है कि कम से कम तुमने प्रतीक तो बचाया था, जो कि पुनः खोज की जा सके।
तो आज भारत में जो बिलकुल ग्रामीण और नासमझ, जिसको कुछ समझ नहीं है, कोई ज्ञान नहीं है, जिसको हम मूढ़ कह सकते हैं, वह जो-जो कर रहा हो, उसको फिर से उठा कर और दो सौ साल पहले के सूत्रों से जोड़ने की, और बीस हजार साल की समझ के साथ पुनरुज्जीवित करने की जरूरत है। और तब आप चकित हो जाएंगे। तब आप चकित हो जाएंगे। तब आप बिलकुल हैरान हो जाएंगे कि हम किस बड़े आत्मघात में लगे हैं!
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३