तिलक (टीका) लगाने का अद्भुत रहस्य….. क्रमशः6……

 तिलक (टीका) लगाने का अद्भुत रहस्य….. क्रमशः6……

ओशो- वैज्ञानिकों का कहना है कि जब हमारी पृथ्वी नहीं बनी थी, तब जो किरणें चली होंगी, एक दिन जब हमारी पृथ्वी समाप्त हो चुकी होगी तब पार होंगी। उन किरणों को कभी पता ही नहीं चलेगा कि बीच में यह पृथ्वी के होने की घटना घट गई। जब पृथ्वी नहीं थी तब वे चलीं और जब पृथ्वी नहीं हो चुकी होगी तब वे पार हो जाएंगी। उनको कभी पता नहीं चलेगा। उन किरणों पर अगर कोई यात्री सवार होकर चले तो पृथ्वी कभी थी, इसका कोई भी पता नहीं चलेगा।
दिन में वे तारे हैं अपनी जगह। उस आदमी को दिखाई पड़ने शुरू हो गए। उसकी आंख को क्या हो गया? उसकी आंख ने एक नया सिलसिला शुरू किया। ऑपरेशन करना पड़ा उसकी आंख का, क्योंकि वह आदमी सामान्य नहीं रह गया। वह आदमी बेचैनी में पड़ गया, वह आदमी कठिनाई में पड़ गया। पर एक बात साफ हुई कि आंख दिन में भी तारों को देख सकती है। अगर आंख दिन में भी तारों को देख सकती है तो आंख की बहुत सी संभावनाएं हैं जो सुप्त पड़ी हैं।
हमारी प्रत्येक इंद्रिय की बहुत सी संभावनाएं हैं जो सुप्त पड़ी हैं। इस जगत में जो हमें चमत्कार दिखाई पड़ते हैं, वे सुप्त पड़ी संभावनाओं का कहीं से टूट पड़ना है, बस! कोई सुप्त संभावना कहीं से प्रकट हो जाती है, हम चमत्कृत हो जाते हैं। वह मिरेकल नहीं है। उतना ही चमत्कार हमारे भीतर भी दबा पड़ा है। पर अप्रकट है, वह प्रकट नहीं हो पा रहा है, वह खुल नहीं पा रहा है। कहीं कोई दरवाजे पर ताला पड़ा है और वह नहीं टूट पा रहा है।
योग की दृष्टि…और योग की दृष्टि कोई एक-दो दिन, वर्ष दो वर्ष की धारणा की नहीं है, कम से कम बीस हजार साल से योग की यह परिपुष्ट दृष्टि है। विज्ञान की किसी दृष्टि पर तो भरोसा नहीं किया जा सकता बहुत, क्योंकि जो विज्ञान छह महीने पहले कह रहा था, छह महीने बाद बदलेगा। लेकिन योग की एक परिपुष्ट दृष्टि है, जो बीस हजार साल–कम से कम। क्योंकि हम जिस सभ्यता में रह रहे हैं वह सभ्यता किसी भी हालत में बीस हजार साल से पुरानी नहीं है। यद्यपि यह हमारा भ्रम है कि हमारी सभ्यता पृथ्वी पर पहली सभ्यता है। हमसे पहले सभ्यताएं हो चुकी हैं और नष्ट हो चुकी हैं। और हमसे पहले आदमी करीब-करीब हमारी ही ऊंचाइयों पर और कभी-कभी हमसे भी ज्यादा ऊंचाइयों पर पहुंच गया और खो गया।
उन्नीस सौ चौबीस में एक घटना घटी। उन्नीस सौ चौबीस में जर्मनी में अणुविज्ञान के संबंध में जो शोध का पहला संस्थान निर्मित हुआ, अचानक एक दिन सुबह एक आदमी, जिसने अपना नाम फल्कानेली बताया, एक कागज लिख कर वहां दे गया। और उस कागज में एक छोटी सी सूचना दे गया कि मुझे कुछ बातें ज्ञात हैं, और कुछ और लोगों को भी ज्ञात हैं, जिनके आधार पर मैं यह खबर देता हूं कि अणु के साथ खोज में मत पड़ना, क्योंकि हमारी सभ्यता के पहले और भी सभ्यताएं इस खोज में पड़ कर नष्ट हो चुकी हैं। इस खोज को बंद ही कर देना। बहुत खोज-बीन की गई, उस आदमी का कुछ पता न चला।
उन्नीस सौ चालीस में हेजेनबर्ग–एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक था जर्मनी का, जिसने कि बड़े से बड़ा काम अणु की खोज में किया–उस आदमी के घर फिर एक आदमी उपस्थित हुआ, जिसने फिर उसे एक चिट्ठी दी, उस पर भी फल्कानेली के ही दस्तखत थे। वह नौकर को चिट्ठी देकर बाहर ही चला गया। उस चिट्ठी में उसने हेजेनबर्ग को सूचना दी थी कि तुम पापी होने का जिम्मा मत लो, क्योंकि यह सभ्यता पहली नहीं है जो कि अणु के साथ उपद्रव में पड़ी हो। इसके पहले बहुत बार सभ्यताएं अणु के साथ खेल में पड़ीं और नष्ट हुईं। मगर फिर भी उस आदमी का कोई पता नहीं चल सका।
और उन्नीस सौ पैंतालीस में जब पहली दफा हिरोशिमा पर एटम गिरा, तो दुनिया के बारह बड़े वैज्ञानिकों को, जिनका कि हाथ था एटम के बनाने में, फल्कानेली के दस्तखत से पत्र मिले जिसमें उसने कहा था कि देखो, अभी भी रुक जाओ। हालांकि तुमने पहला कदम उठा लिया है, और पहला कदम उठाने के बाद आखिरी कदम बहुत दूर नहीं रहता। ओपनहीमर, जो अमरीका का सबसे बड़ा अणुशास्त्री था, जिसने कि अणु बनाने में बड़े से बड़ा भाग बंटाया, उसने तत्काल उस पत्र के मिलते ही से अणु आयोग से इस्तीफा दिया और उसने एक वक्तव्य दिया कि वी हैव सिंड, हमने पाप किया है। और यह आदमी हर वक्त खबर देता रहा। पर यह आदमी कौन है, इसका कोई पता नहीं लग सका कि यह आदमी कौन है! इस बात की पूरी संभावना है कि वह जो कह रहा है, ठीक कह रहा है। अणु के साथ खिलवाड़ सभ्यताएं पहले भी कर चुकी हैं।
हमने भी महाभारत में अणु के साथ खिलवाड़ कर लिया है। और उसके साथ हम बर्बाद हुए। असल में करीब-करीब ऐसा है जैसे कि एक व्यक्ति बच्चा होता है, जवान होता है, और जवानी में वही भूलें करता है जो उसके बाप ने की थीं। हालांकि बाप बूढ़ा होकर उसको समझाता है कि इन भूलों में मत पड़ना, यह सब गड़बड़ है। लेकिन उसके बाप ने भी इस बूढ़े को समझाई थीं यही बातें। और ऐसा नहीं है कि इस बूढ़े के बूढ़े बाप को समझाने वाला बाप नहीं था, उसने भी समझाई थीं। बाकी जवानी में वही भूलें होती हैं, फिर बुढ़ापे में वही समझाहट होती है। बच्चा होता है, जवान होता है, बूढ़ा होता है, मरता है–जैसे व्यक्ति एक चक्र में दौड़ कर विघटित हो जाता है, ऐसे ही हर सभ्यता भी करीब-करीब एक से स्टेप उठा कर नष्ट होती है। सभ्यताएं भी बचपन में होती हैं, जवान होती हैं, बूढ़ी होती हैं और मरती हैं।
यह जो योग की बीस हजार साल की…बीस हजार साल की मैं इसलिए कहता हूं कि बीस हजार साल का हिसाब थोड़ा साफ है। वैसे इसे और भी साफ करना हो तो बीस हजार साल के पहले जो सभ्यताएं रही हैं, उनको बिना जाने साफ नहीं किया जा सकता। एक आदमी की जवानी ठीक से समझनी हो तो दस आदमियों की जवानी समझनी जरूरी है, अकेली नहीं समझी जा सकती। कोई रिफरेंस नहीं होता, कोई संदर्भ नहीं होता। कैसे समझा जाए वह क्या कर रहा है? ठीक कर रहा है कि गलत कर रहा है? एक आदमी का बुढ़ापा समझना हो तो पच्चीस बूढ़ों पर नजर डालनी जरूरी है। नहीं तो अधूरा-अधूरा होगा। एक-एक व्यक्ति अपने आप में कुछ भी नहीं बता पाता है। एक-एक घटना कुछ नहीं कहती। लेकिन बीस हजार साल का इतिहास साफ है।
इस बीस हजार साल में योग निरंतर एक बात कहता रहा है कि आज्ञाचक्र के साथ जुड़ा हुआ आधा मस्तिष्क है जो बंद पड़ा है, अगर तुम्हें संसार के पार कुछ जानना है तो उस आधे मस्तिष्क को सक्रिय करना जरूरी है। अगर परमात्मा के संबंध में कोई यात्रा करनी है तो वह आधा मस्तिष्क सक्रिय होना जरूरी है। अगर पदार्थ के पार देखना है तो वह आधा मस्तिष्क सक्रिय होना जरूरी है।
उसका द्वार है आज्ञा। वह जहां आप तिलक लगाते हैं, वह तो कॉरस्पांडिंग हिस्सा है आपकी चमड़ी के ऊपर। उससे अंदाजन डेढ़ इंच भीतर–अंदाजन कहता हूं, क्योंकि किसी का थोड़ा ज्यादा, किसी का थोड़ा कम–अंदाजन डेढ़ इंच भीतर वह बिंदु है जो द्वार का काम करता है, पदार्थ-अतीत, भावातीत जगत के लिए।
तिब्बत ने तो, जैसा हमने तिलक आविष्कृत किया, तिब्बत ने तो ठीक ऑपरेशंस भी आविष्कृत किए। और तिब्बत ही कर सकता था। क्योंकि तिब्बत ने जितनी मेहनत की है मनुष्य के तीसरे नेत्र पर, वह थर्ड आई पर, उतनी किसी और सभ्यता ने नहीं की है। सच तो यह है कि तिब्बत का पूरा का पूरा विज्ञान और पूरी समझ, जीवन के अनेक आयामों की समझ, उस तीसरे नेत्र की ही समझ पर आधारित है।
जैसा मैंने कायसी का आपके लिए कहा, तो कायसी तो एक व्यक्ति है, तिब्बत में तो सैकड़ों साल से, व्यक्ति जब तक समाधि में न जाए तब तक दवा का कोई पता ही नहीं लगाते रहे हैं। यह पूरी सभ्यता ही वह काम करती रही है। समाधिस्थ व्यक्ति से ही दवा पूछेंगे। उसकी दवा का ही उपयोग है। बाकी तो सब अंधेरे में टटोलना है।
उन्होंने तो ऑपरेशंस भी विकसित किए। ठीक इस डेढ़ इंच के भीतर जो जगह है, उस पर ऑपरेशंस भी करने के प्रयोग किए। उसको बाहर से भी तोड़ने की कोशिश की। वह टूट जाती है, बाहर से भी टूट जाती है। लेकिन बाहर से टूटने में और भीतर से टूटने में एक फर्क है, इसलिए भारत ने कभी उसको बाहर से तोड़ने की कोशिश नहीं की। वह मैं आपको खयाल में दे दूं।
उसे बाहर से तोड़ने पर भी आधा मस्तिष्क सक्रिय हो जाता है। बहुत संभावना यह है कि वह अपने इस नये आधे मस्तिष्क की सक्रियता का दुरुपयोग करेगा। उसकी चेतना में कोई अंतर नहीं हुए हैं, वह आदमी वही का वही है। उसकी चेतना में कोई साधनागत अंतर नहीं हुए हैं, और उसके मस्तिष्क में नये काम शुरू हो गए। अगर वह आदमी आज दीवाल के पार देख सकता है, तो इस बात की बहुत कम संभावना है कि वह कुएं में किसी गिरे आदमी को देख कर निकालने जाएगा। इस बात की बहुत संभावना है कि किसी के गड़े हुए खजाने को खोदने जाएगा। अगर वह आदमी यह देख सकता है कि उसके भीतरी इशारे से आपको आज्ञा दी जा सकती है, तो इस बात की बहुत कम संभावना है कि आपसे वह कोई अच्छा काम करवाएगा। इस बात की बहुत संभावना है कि आपसे वह कोई बुरा काम करवाएगा।
ऑपरेशन हो सकता था, भारत को भी उसके सूत्र पता थे, पर उसका कभी प्रयोग नहीं किया। नहीं प्रयोग किया इसीलिए कि जब तक व्यक्ति की चेतना भी भीतर से इतनी विकसित न हो कि नई शक्तियों का उपयोग करने में समर्थ हो जाए, तब तक उसे नई शक्तियां देना खतरनाक है। बच्चे के हाथ में जैसे हम तलवार दे दें। बहुत डर तो यह है कि वह दो-चार को काटेगा, डर यह भी है कि वह अपने को भी काटेगा। और बच्चे के हाथ में दी गई तलवार से किसी का भी मंगल हो सकेगा, इसकी आशा करना दुराशा मात्र है। चेतना के तल पर अगर व्यक्ति के भीतर की चेतना विकसित न हो, उसके हाथ में नई शक्तियां देना खतरनाक है।
तिब्बत में, जहां हम तिलक लगाते रहे हैं, वहां ठीक भीतर तक भी छेद करने की कोशिश की है भौतिक उपकरणों से। इसलिए तिब्बत बहुत सी बातें जान पाया, बहुत से अनुभव कर पाया, लेकिन फिर भी तिब्बत कोई नैतिक अर्थों में महान देश नहीं बन पाया। यह बड़ी आश्चर्यजनक घटना है। तिब्बत बहुत काम कर पाया, लेकिन फिर भी नैतिक अर्थों में वह एक बुद्ध भी पैदा नहीं कर पाया। उसकी जानकारी बढ़ी, उसकी शक्ति बढ़ी, अनूठी बातों का उसे पता चला; लेकिन उन सबका उपयोग बहुत छोटी बातों में हुआ, उनका बहुत बड़ी बातों में उपयोग नहीं हो सका।
भारत ने कोई सीधा भौतिक प्रयोग करने की कभी चेष्टा नहीं की। चेष्टा यह की कि भीतर से चेतना को इकट्ठा करके इतना कनसनट्रेट, इतना एकाग्र किया जाए कि चेतना की शक्ति से ही वह तीसरा नेत्र खुल जाए, उसके ही प्रवाह में खुल जाए। क्योंकि उसके प्रवाह को तीसरे नेत्र तक लाना एक बड़ा नैतिक उपक्रम है। उसे इतना ऊपर चढ़ाना! क्योंकि साधारणतः हमारा मन नीचे की तरफ बहता है।
सच तो यह है कि हमारा मन सेक्स-सेंटर की तरफ ही बहता रहता है। हम कुछ भी करते हों–हम चाहे धन कमाते हों, चाहे पद की चेष्टा करते हों, चाहे कुछ भी करते हों–हमारे सब करने के पीछे कहीं गहरे में कामवासना हमें खींचती रहती है। धन भी हम कमाते हैं तो इसी आशा में कि उससे काम खरीदा जा सके; और पद की भी हम इच्छा करते हैं इसी आशा में कि पद पर बैठ कर हम ज्यादा शक्तिशाली हो जाएंगे काम को खरीद लेने में।
इसलिए अगर पुराने दिनों में राजा की इज्जत का पता इससे चलता था कि कितनी रानियां उसके पास हैं, तो वह ठीक मेजरमेंट था। क्योंकि पद का और कोई मूल्य क्या है? पद का करोगे क्या? कितनी स्त्रियां तुम्हारे हरम में हैं, उससे पता चल जाएगा कि तुम कितने बड़े पद पर हो। पद का भी उपयोग, धन का भी उपयोग घूम कर तो कामवासना के लिए ही होना है।
हम जो भी करेंगे, हमारी सारी शक्ति काम के केंद्र की तरफ दौड़ती रहेगी। और जब तक शक्ति काम के केंद्र की तरफ दौड़ रही है तभी तक व्यक्ति अनैतिक हो सकता है। अगर शक्ति को ऊपर की तरफ दौड़ानी है तो काम की यात्रा रूपांतरित करनी पड़ेगी। अगर आज्ञाचक्र की तरफ शक्ति को ले चलना है तो काम की यात्रा को बदलना पड़ेगा–रुख, पूरा ध्यान, पीठ ही फेर लेनी पड़ेगी नीचे की तरफ और मुंह करना पड़ेगा ऊपर की तरफ, ऊर्ध्वमुखी होना पड़ेगा।
यह जो ऊर्ध्वगमन है, यह यात्रा बड़ी नैतिक होगी। इसमें इंच-इंच संघर्ष होगा, इसमें एक-एक कदम कुर्बानी होगी। इसमें जो क्षुद्र है उसे खोने की तैयारी दिखानी पड़ेगी, ताकि विराट मिल सके। इसमें कीमत चुकानी पड़ेगी। और इतनी सारी कीमत चुका कर जो व्यक्ति आज्ञाचक्र तक पहुंचता है, उसे जो विराट शक्ति उपलब्ध होती है, वह उसका दुरुपयोग कैसे कर पाएगा? दुरुपयोग का कोई सवाल नहीं उठता। दुरुपयोग करने वाला तो इस मंजिल तक पहुंचने के पहले समाप्त हो गया होता है।
इसलिए तिब्बत में ब्लैक मैजिक पैदा हुआ, यह ऑपरेशन की वजह से। तिब्बत में अध्यात्म कम पैदा हुआ, और जिसको हम कहें कि शैतानी ढंग का उपद्रव ज्यादा पैदा हुआ, ब्लैक मैजिक पैदा हुआ। इस तरह की ताकत हाथ में आनी शुरू हो गई…।
सूफियों में एक कहानी है, जीसस के बाबत। ईसाइयों में उसका कोई उल्लेख नहीं है, इसलिए मैं सूफियों से कहता हूं। जीसस की बहुत सी कहानियां सूफियों के पास हैं, ईसाइयों के पास नहीं हैं। कई बार तो बहुत महत्वपूर्ण घटनाएं मुसलमानों के पास हैं, ईसाइयों के पास नहीं हैं, जीसस के जीवन में। यह घटना भी उनमें से एक है, कि जीसस के तीन शिष्य जीसस के पीछे पड़े हैं। और उनसे कहते हैं कि हमने सुना है और देखा भी, कि आप मुर्दे को कहते हैं कि उठ जाओ, और वह उठ जाता है। हमें तुम्हारा मोक्ष नहीं चाहिए, हमें तुम्हारा स्वर्ग नहीं चाहिए, हमें तो सिर्फ यह तरकीब सिखा दो–यह मरा हुआ आदमी कैसे जिंदा हो जाता है? जीसस उनसे कहते हैं, लेकिन इस मंत्र का उपयोग तुम स्वयं पर कभी न कर पाओगे। क्योंकि तुम मर चुके होओगे, फिर मंत्र का उपयोग कैसे करोगे? और दूसरे को जिलाने से तुम्हें क्या फायदा होगा? मैं तुम्हें वह तरकीब बताता हूं जिससे कि तुम मरो ही न! लेकिन वे कहते हैं, हमें इससे कोई…। आप हमें बहलाएं मत, हमें तो यह मुद्दे की बात बता दें। यह चीज जानने जैसी है।
वे इतने पीछे पड़े हैं कि जीसस ने कहा कि ठीक है। जीसस ने उन्हें वह सूत्र बता दिया, जिस सूत्र के उपयोग से मरा हुआ जिंदा हो जाता है।
अब वे तीनों भागे। उसी दिन जीसस को छोड़ कर भाग गए, मुर्दे की तलाश में। अब देर करनी उचित नहीं, मंत्र में कोई शब्द भूल जाए, कोई गड़बड़ हो जाए, इसका जल्दी प्रयोग करके देख लें। दुर्भाग्य, गांव में गए, कोई मुर्दा नहीं! दूसरे गांव की तरफ निकले तो बीच में अस्थिपंजर पड़ा हुआ मिल गया। तो उन्होंने कहा कि ठीक। मुर्दा भी नहीं मिला, अब चलो यही ठीक है। मंत्र पढ़ा। जल्दी थी बहुत। वे शेर के अस्थिपंजर थे। शेर उठ कर खड़ा हो गया, वह उन तीनों को खा गया।
सूफी कहते हैं कि यही होगा। वह जो कुतूहल–और अनैतिक चित्त का कुतूहल खतरे में ले जाता है। तो बहुत बार बहुत से सूत्र जान कर भी छिपा लिए गए बार-बार कि वे गलत आदमी के हाथ में न पड़ जाएं। सामान्य आदमी को भी खबर दी गई तो उसे इस ढंग से दिया गया कि जब वह योग्य हो जाए तभी उसे पता चल पाए।
सोचेंगे आप, तिलक के संबंध में मैं यह क्यों कह रहा हूं? क्रमशः……

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३