तिलक (टीका) लगाने का अद्भुत रहस्य….. क्रमशः4……

 तिलक (टीका) लगाने का अद्भुत रहस्य….. क्रमशः4……

ओशो- जैसे-जैसे यह तिलक नीचे आता जाएगा वैसे-वैसे प्रयोग बदलने पड़ेंगे साधना के। यह करीब-करीब वैसा ही काम करेगा जैसे कि अस्पताल में मरीज के पास लटका हुआ चार्ट काम करता है। वह नर्स आकर, देख कर चार्ट पर लिख जाती है–कितना है ताप, कितना है ब्लडप्रेशर, क्या है, क्या नहीं है। डॉक्टर को आकर देखने की जरूरत नहीं होती, वह चार्ट पर एक क्षण नजर डाल लेता है, बात पूरी हो जाती है। पर इससे भी अदभुत था यह प्रयोग कि माथे पर पूरा का पूरा इंगित लगा था, यह सब तरह की खबर देता। और अगर यह ठीक-ठीक इसका प्रयोग किया जाता तो गुरु को पूछने की कभी जरूरत न पड़ती कि क्या हो रहा है, क्या नहीं हो रहा है। वह जानता है कि क्या हो रहा है। और क्या सहायता पहुंचानी है, वह भी जानता है। क्या प्रयोग बदलना है, कौन सी विधि रूपांतरित करनी है, वह भी जानता है।
एक तो साधना की दृष्टि से तिलक का ऐसा मूल्य था। दूसरा, जो हमारी तीसरी आंख का बिंदु है, वह हमारे संकल्प का भी बिंदु है। उसको योग में आज्ञाचक्र कहते हैं। आज्ञाचक्र इसीलिए कहते हैं कि हमारे जीवन में जो कुछ भी अनुशासन है वह उसी चक्र से पैदा होता है। हमारे जीवन में जो भी व्यवस्था है, जो भी आर्डर है, जो भी संगति है, वह उसी बिंदु से पैदा होती है।
इसे ऐसा समझें। हम सबके शरीर में सेक्स का सेंटर है। सेक्स से समझना आसान पड़ जाएगा, क्योंकि वह हम सबका परिचित है, यह आज्ञा का चक्र तो हम सबका परिचित नहीं है। हमारे जीवन की सारी वासना और कामना सेक्स के चक्र से पैदा होती है। जब तक वह चक्र सक्रिय नहीं होता तब तक कामवासना पैदा नहीं होती। कामवासना लेकर बच्चा पैदा होता है, कामवासना का पूरा यंत्र लेकर पैदा होता है, कोई कमी नहीं होती।
कुछ मामले में तो बहुत हैरानी की बात है। स्त्रियां तो अपने जीवन के सारे रजकण भी लेकर पैदा होती हैं, फिर कोई नया रजकण पैदा नहीं होता। प्रत्येक स्त्री कितने बच्चों को जन्म दे सकती है, वह सबके अंडे लेकर पैदा होती है–करोड़ों। पहले दिन की बच्ची भी जब मां के पेट से पैदा होती है, तो अपने जीवन के समस्त अंडों की संख्या अपने भीतर लिए हुए पैदा होती है। हर महीना एक अंडा उसके कोष से निकल कर सक्रिय हो जाएगा। अगर वह अंडा पुरुष वीर्य से मिल जाए, संयुक्त हो जाए, तो बच्चे का जन्म हो जाएगा। एक भी नया अंडा स्त्री में पैदा नहीं होता। सारे अंडे लेकर पैदा होती है। लेकिन फिर भी कामवासना नहीं पैदा होती तब तक, जब तक कि कामवासना का चक्र शुरू न हो जाए। वह चक्र जब तक अगति में पड़ा है, ठहरा हुआ है, तब तक–काम का पूरा यंत्र है, काम की पूरी आयोजना है, शरीर के पास काम की पूरी शक्ति है–लेकिन फिर भी कामवासना पैदा नहीं होगी। कामवासना पैदा होगी, जैसे ही काम का सेंटर गतिमान होगा, गत्यात्मक होगा। चौदह वर्ष की उम्र में या तेरह वर्ष की उम्र में वह गतिमान हो जाएगा। गतिमान होते ही से जो यंत्र पड़ा था बंद बिलकुल, वह पूरी सक्रियता ले लेगा।
एक ही चक्र से आमतौर से हम परिचित हैं। और वह भी हम इसीलिए परिचित हैं क्योंकि उसे हम शुरू नहीं करते, उसे प्रकृति शुरू करती है। अगर हमें ही उसे भी शुरू करना हो तो इस जगत में थोड़े से ही लोग कामवासना से परिचित हो पाएंगे। वह तो प्रकृति शुरू करती है,
इसलिए हमें पता चलता है कि वह है।
कभी आपने सोचा है, जरा सा विचार वासना का, और जननेंद्रिय का पूरा यंत्र सक्रिय हो जाता है। विचार चलता है मस्तिष्क में, यंत्र होता है बहुत दूर! कभी आपने सोचा है कि जरा सा कामवासना का मन में, जरा सी झलक, और तत्काल चक्र सक्रिय हो जाता है। असल में आपके चित्त में कामवासना का कोई भी विचार उठे वह तत्काल जो सेक्स का सेंटर है उसे अपनी ओर खींच लेता है। कहीं भी उठे शरीर में, तत्काल वह अपने सेंटर पर चला जाएगा। उसे जाना ही पड़ेगा, उसे जाने की और कोई जगह नहीं है। जैसे पानी गड्ढे में चला जाता है, ऐसा प्रत्येक संबंधित विचार अपने चक्र पर चला जाता है।
दोनों आंखों के बीच में जो तीसरे नेत्र की मैं बात कर रहा हूं, वही जगह आज्ञाचक्र की है। इस आज्ञा के संबंध में थोड़ी बात समझ लेनी जरूरी है।
जिन लोगों के जीवन में भी यह चक्र प्रारंभ नहीं होगा, वे हजार तरह की गुलामियों में बंधे रहेंगे, वे गुलाम ही रहेंगे। इस चक्र के बिना कोई स्वतंत्रता नहीं है। यह बहुत हैरानी की बात मालूम पड़ेगी। क्योंकि हमने बहुत तरह की स्वतंत्रताएं सुनी हैं–राजनैतिक, आर्थिक। वे कोई स्वतंत्रताएं वास्तविक नहीं हैं। क्योंकि जिस व्यक्ति का आज्ञाचक्र सक्रिय नहीं है, वह किसी न किसी तरह की गुलामी में रहेगा। एक गुलामी से छूटेगा दूसरी में पड़ेगा, दूसरी से छूटेगा तीसरी में पड़ेगा, वह गुलाम रहेगा ही। उसके पास मालिक होने का तो अभी चक्र ही नहीं है, जहां से मालकियत की किरणें पैदा होती हैं। उसके पास संकल्प जैसी, विल जैसी कोई चीज ही नहीं है। वह अपने को आज्ञा दे सके ऐसी उसकी सामर्थ्य ही नहीं है, बल्कि उसका शरीर और उसकी इंद्रियां ही उसको आज्ञा दिए चली जाती हैं। पेट कहता है भूख लगी है, तो उसको भूख लगती है। कामवासना का बिंदु कहता है वासना जगी, तो उसे वासना जगती है। शरीर कहता है बीमार हूं, तो वह बीमार हो जाता है। शरीर कहता है बूढ़ा हो गया, तो वह बूढ़ा हो जाता है। शरीर आज्ञा देता है, आदमी आज्ञा मान कर चलता रहता है।
यह जो आज्ञाचक्र है, इसके जगते ही शरीर आज्ञा देना बंद कर देता है और आज्ञा लेना शुरू करता है। पूरा का पूरा आयोजन बदल जाता है और उलटा हो जाता है। वैसा आदमी अगर खून–बहते हुए खून को कह दे कि रुक जाओ, तो वह बहता हुआ खून रुक जाएगा। वैसा आदमी कह दे हृदय की धड़कन को कि ठहर जा, तो हृदय की धड़कन ठहर जाएगी। वैसा आदमी कहे अपनी नब्ज से कि मत चल, तो नब्ज चल न सकेगी। वैसा आदमी अपने शरीर, अपने मन, अपनी इंद्रियों का मालिक हो जाता है। पर इस चक्र के बिना शुरू हुए मालिक नहीं होता। इस चक्र का स्मरण जितना ज्यादा रहे, उतनी ही ज्यादा आपके भीतर, जिसको कहें स्वयं की मालिकी, पैदा होनी शुरू होती है। आप गुलाम की जगह मालिक बनना शुरू होते हैं।
तो योग ने इस चक्र को जगाने के बहुत-बहुत प्रयोग किए हैं। उसमें तिलक भी एक प्रयोग है। स्मरणपूर्वक, अगर कोई चौबीस घंटे इस चक्र पर बार-बार ध्यान को ले जाता रहे–और अगर तिलक लगा हुआ है तो बार-बार ध्यान जाएगा। तिलक के लगते ही वह स्थान पृथक हो गया। और बहुत सेंसिटिव स्थान है। अगर तिलक ठीक जगह लगा है तो आप हैरान होंगे कि आपको उसकी याद करनी ही पड़ेगी, वह बहुत संवेदनशील जगह है। संभवतः शरीर में सर्वाधिक संवेदनशील जगह है। उसकी संवेदनशीलता को स्पर्श करना, और वह भी खास चीजों से स्पर्श करने की बात थी।
जैसे चंदन का तिलक लगाना। अब यह सैकड़ों और हजारों प्रयोगों के बाद तय किया था कि चंदन का क्यों प्रयोग करना। एक तरह की रेजोनेंस है चंदन में और संवेदनशीलता में। वह चंदन का तिलक उस बिंदु की संवेदनशीलता को और गहन करता है, और घना कर जाता है। हर कोई तिलक नहीं कर जाएगा। कुछ चीजों के तिलक तो उसकी संवेदनशीलता को मार देंगे, बुरी तरह मार देंगे। जैसे आज स्त्रियां टीका लगा रही हैं बहुत से। बाजारू हैं वे, उनकी कोई वैज्ञानिकता नहीं है, उनका योग से कोई लेना-देना नहीं है। वे बाजारू टीके नुकसान करेंगे। वे नुकसान करेंगे इसलिए क्योंकि सवाल यह है कि वे संवेदनशीलता को बढ़ाते हैं या घटाते हैं? अगर घटाते हैं संवेदनशीलता को तो नुकसान करेंगे, अगर बढ़ाते हैं तो फायदा करेंगे। और प्रत्येक चीज के अलग-अलग परिणाम हैं। इस जगत में छोटे से फर्क से सारा फर्क पड़ता है। तो कुछ विशेष चीजें खोजी गई थीं, जिनका ही उपयोग किया जाए।
आज्ञा का चक्र संवेदनशील हो सके, सक्रिय हो सके, तो आपके व्यक्तित्व में गरिमा और इंटिग्रिटी आनी शुरू होती है, एक समग्रता पैदा होती है। आप एकजुट होने लगते हैं, कोई चीज आपके भीतर इकट्ठी हो जाती है; खंड-खंड नहीं, अखंड हो जाती है।

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३