तिलक (टीका) लगाने का अद्भुत रहस्य….. क्रमशः3……

ओशो– ये दोनों घटनाएं मैंने आपसे कहीं यह इंगित करने को कि आपकी दोनों आंखों के बीच में एक बिंदु है जहां से यह संसार नीचे छूट जाता है और दूसरा संसार शुरू होता है। वह बिंदु द्वार है। उसके इस पार, जिस जगत से हम परिचित हैं वह है, उसके उस पार एक अपरिचित और अलौकिक जगत है। इस अलौकिक जगत के प्रतीक की तरह सबसे पहले तिलक खोजा गया।
तो तिलक हर कहीं लगा देने की बात नहीं है। वह तो जो व्यक्ति हाथ रख कर आपका बिंदु खोज सकता है वही आपको बता सकता है कि तिलक कहां लगाना है। हर कहीं तिलक लगा लेने से कोई मतलब नहीं है, कोई प्रयोजन नहीं है।
फिर प्रत्येक व्यक्ति का बिंदु भी एक ही जगह नहीं होता। यह जो दोनों आंखों के बीच तीसरी आंख है, यह प्रत्येक व्यक्ति की बिलकुल एक जगह नहीं होती, अंदाजन दोनों आंखों के बीच में ऊपर होती है, पर फर्क होते हैं। अगर किसी व्यक्ति ने पिछले जन्मों में बहुत साधना की है और समाधि के छोटे-मोटे अनुभव पाए हैं तो उसी हिसाब से वह बिंदु नीचे आता जाता है। अगर इस तरह की कोई साधना नहीं की है तो वह बिंदु काफी ऊपर होता है। उस बिंदु की अनुभूति से यह भी जाना जा सकता है कि आपके पिछले जन्मों की साधना कुछ है समाधि की दिशा में? आपने तीसरी आंख से कभी दुनिया को देखा है? कभी भी आपके किसी जन्म में ऐसी कोई घटना घटी है? तो आपका वह बिंदु, उसका स्थान बताएगा कि ऐसी घटना घटी है या नहीं घटी है। अगर ऐसी घटना बहुत घटी है तो वह बिंदु बहुत नीचे आ जाएगा। वह करीब-करीब दोनों आंखों के समतुल भी आ जाता है, उससे नीचे नहीं आ सकता। और अगर बिलकुल समतुल बिंदु हो, दोनों आंखों के बिलकुल बीच में आ गया हो, तो जरा से इशारे से आप समाधि में प्रवेश कर सकते हैं। इतने छोटे इशारे से कि जिसको हम कह सकते हैं इशारा बिलकुल असंगत है।
इसलिए बहुत दफे जब कुछ लोग बिलकुल ही अकारण समाधि में प्रवेश कर जाते हैं, तो हमें लगता है, बड़ी अजीब सी बात मालूम पड़ती है। जैसे कि झेन साध्वी के जीवन में कथा है। लौटती थी कुएं से पानी भर कर, घड़ा गिर गया। और घड़े के गिरने के साथ समाधि लग गई, और पूर्ण ज्ञान उपलब्ध हुआ। बिलकुल फिजूल की बात है! घड़े का गिरना या घड़े का फूट जाना और समाधि का लगना, कोई संगति नहीं है। लाओत्से के जीवन में उल्लेख है कि वृक्ष के नीचे बैठा था, पतझड़ के दिन थे। और वृक्ष से पत्ते नीचे गिरने लगे, और लाओत्से परम ज्ञान को उपलब्ध हो गया। अब वृक्ष से गिरते हुए पत्तों का कोई भी तो संबंध नहीं है। कोई भी संबंध नहीं है। लेकिन यह घटना तब घट सकती है जब कि पिछले जन्मों में यात्रा इतनी हो चुकी हो कि वह तीसरा बिंदु दोनों आंखों के बिलकुल बीच में आ गया हो। तब यह घटना घट सकती है, क्योंकि शायद आखिरी तिनके की जरूरत है और तराजू बैठ जाए। आखिरी तिनका कोई भी चीज बन सकती है।
तो पुराने दिनों में जब भी दीक्षा दी जाती, और दीक्षा वही दे सकता है जो आपकी समस्त जन्मों की सार-संपदा क्या है उसे समझ पाता हो, अन्यथा नहीं दे सकता। अन्यथा देने का कोई मतलब नहीं है। क्योंकि जहां तक आप पहुंच गए हैं उसके आगे यात्रा करनी है। तो वह जो तिलक है अगर ठीक-ठीक लगाया जाए, तो वह कई अर्थों का सूचक था। वे सारे अर्थ समझने पड़ेंगे।
पहला तो वह इस बात का सूचक था कि जब एक बार गुरु ने बता दिया कि तिलक यहां लगाना है ठीक जगह और आपको भी जब उस ठीक जगह का अनुभव होने लगा, क्योंकि तिलक लगाने का पहला प्रयोजन यही है। आपने कभी खयाल न किया होगा कि अगर आप आंख बंद करके भी बैठ जाएं, और कोई व्यक्ति आपकी बंद आंख में भी आपकी दोनों आंखों के बीच में सिर के पास अंगुली ले जाए, तो बंद आंख में भी आपको भीतर अहसास होना शुरू हो जाएगा कि कोई आंख की तरफ अंगुली किए हुए है। वह तीसरी आंख की प्रतीति है।
तो अगर ठीक तीसरी आंख पर तिलक लगा दिया जाए, और उसी मात्रा का, उतने ही अनुपात का तिलक लगा दिया जाए जितनी बड़ी तीसरी आंख की स्थिति है, तो आपको पूरे शरीर को छोड़ कर उसी का स्मरण चौबीस घंटे रहने लगेगा। वह स्मरण पहला तो यह काम करेगा कि आपका शरीर-बोध कम होता जाएगा, और तिलक-बोध बढ़ता जाएगा। एक क्षण ऐसा आ जाता है जब कि पूरे शरीर में सिर्फ तिलक ही स्मरण रह जाता है, बाकी सारा शरीर भूल जाता है। और जिस दिन ऐसा हो जाए, उसी दिन आप उस आंख को खोलने में समर्थ हो सकते हैं।
तो तिलक के साथ जुड़ी हुई साधनाएं थीं कि पूरे शरीर को भूल जाओ, सिर्फ तिलक-मात्र की जगह याद रह जाए। उसका अर्थ यह हुआ कि सारी चेतना सिकुड़ कर फोकस्ड हो जाए तीसरी आंख पर और तीसरी आंख के खोलने की जो कुंजी है वह फोकस्ड कांशसनेस है। उस पर चेतना पूरी की पूरी इकट्ठी हो जाए, सारे शरीर से सिकुड़ कर उस छोटे से स्थान पर लग जाए। बस, उसकी मौजूदगी से काम हो जाएगा।
जैसे कि हम सूरज की किरणों को एक छोटे से लेंस के द्वारा एक कागज पर गिरा लें। इकट्ठी हो गई किरणें आग पैदा कर देंगी। वे ही किरणें सिर्फ धूप पैदा कर रही थीं, उनसे आग पैदा नहीं होती थी। वे ही किरणें आग पैदा कर सकती हैं–संगृहीत। चेतना शरीर पर बंटी रहती है तो सिर्फ जीवन का कामचलाऊ उपयोग उससे होता है। चेतना अगर तीसरे नेत्र के पास पूरी इकट्ठी हो जाए, तो वह जो तीसरे नेत्र में बाधा है, वह जो द्वार है, जो बंदपन है, वह टूट जाता है, जल जाता है, राख हो जाता है, और हम उस आकाश को देखने में समर्थ हो जाते हैं जो हमारे ऊपर फैला है।
तो तिलक का पहला उपयोग तो यह था कि आपको ठीक-ठीक जगह बता दी जाए शरीर में कि चौबीस घंटे इस जगह का स्मरण रखना है। सब तरफ से चेतना को सिकोड़ कर इस जगह ले आना है। एक! और दूसरा यह था प्रयोग कि गुरु को रोज-रोज देखने की जरूरत न पड़े, रोज आपके माथे पर हाथ रखने की भी जरूरत न पड़े; क्योंकि जैसे-जैसे वह बिंदु नीचे सरकेगा वैसे-वैसे आपको अहसास होगा, और आपके तिलक को भी नीचे होते जाना है। आपको रोज तिलक लगाते वक्त ठीक वहीं तिलक लगाना है जहां वह बिंदु आपको अहसास होता है।
तो हजार शिष्य हैं एक गुरु के। वह शिष्य आता है, झुकता है, तभी वह देख लेता है कि तिलक कहां है। इसकी बात करने की जरूरत नहीं रह जाती। वह देख लेता है कि तिलक नीचे सरक रहा है कि नहीं सरक रहा है? तिलक उसी जगह है कि तिलक में कोई अंतर पड़ रहा है? वह कोड है। दिन में दो-चार दफे शिष्य आएगा और वह देख पाएगा कि तिलक! रोज सुबह शिष्य उसके चरण छूने आएगा और वह देख पाएगा कि वह तिलक गतिमान है? वह आगे गति कर रहा है? रुका हुआ है? ठहरा हुआ है? और किसी दिन वह शिष्य के माथे पर हाथ रख कर पुनः देख पाएगा। अगर शिष्य को पता नहीं चल रहा है हटने का, तो उसका मतलब है कि चेतना पूरी की पूरी इकट्ठी नहीं की जा रही है। अगर वह तिलक गलत जगह लगाए हुए है और बिंदु दूसरी जगह है, तो उसका मतलब है कि उसकी कांशसनेस, उसकी रिमेंबरिंग, उसकी स्मृति ठीक बिंदु को नहीं पकड़ पा रही है। वह भी उसे पता चल जाएगा। क्रमशः……..
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३