तिलक (टीका) लगाने का अद्भुत रहस्य….. क्रमशः2……

ओशो- एक दूसरी घटना और, और तब मैं आपको तिलक के संबंध में कुछ कहूं, तब आपकी समझ में आना आसान होगा; क्योंकि तिलक का संबंध उस तीसरी आंख से है।
उन्नीस सौ पैंतालीस में एक आदमी मरा अमरीका में–एडगर कायसी। चालीस साल पहले उन्नीस सौ पांच में वह बीमार पड़ा और बेहोश हो गया। और तीन दिन कोमा में पड़ा रहा। चिकित्सकों ने आशा छोड़ दी, और चिकित्सकों ने कहा कि हमें इसे कोमा के बाहर, बेहोशी के बाहर लाने का कोई उपाय नहीं सूझता। और बेहोशी इतनी गहन है कि अब यह शायद ही वापस लौट सके।
तीसरे दिन सारी आशा छोड़ दी गई; सब दवाइयां, सब इलाज कर लिए गए, लेकिन होश का कोई लक्षण नहीं था। तीसरे दिन शाम को चिकित्सकों ने कहा कि अब हम विदा होते हैं, क्योंकि अब हमारे वश के बाहर है। यह चार-छह घंटे में युवक मर जाएगा। और अगर बच गया तो सदा के लिए पागल हो जाएगा, जो कि मरने से भी बुरा सिद्ध होगा। क्योंकि इतनी देर में इसके मस्तिष्क के जो सूक्ष्म तंतु हैं, वे विसर्जित हो रहे हैं, डिसइंटीग्रेट हो रहे हैं।
अचानक चिकित्सक हैरान हुए। वह जो बेहोश कायसी पड़ा था बोला! वह बेहोश था तीन दिन से, वह बोला। जैसे कि कोई गहरी नींद से अचानक बोल उठे। हैरानी और ज्यादा हो गई, क्योंकि उसका कोमा जारी था। उसका शरीर अभी भी पूरी तरह कोमा में था। उसके हाथ में आप छुरी भी भोंक दो तो पता नहीं चलती थी। लेकिन वाणी आ गई, और कायसी ने कहा कि शीघ्रता करो! मैं एक वृक्ष से गिर पड़ा था, और मेरी रीढ़ में पीछे चोट लग गई है, और उसी चोट के कारण मैं बेहोश हूं। और अगर छह घंटे में मुझे ठीक नहीं किया गया तो बीमारी का जहर मेरे मस्तिष्क तक पहुंच जाएगा, फिर मेरे जिंदा बचने का कोई अर्थ नहीं है। और इस-इस नाम की जड़ी-बूटियां ले आओ और उनको इस तरह से तैयार करके मुझे पिला दो, मैं बारह घंटे के भीतर ठीक हो जाऊंगा। और कायसी फिर बेहोश हो गया।
जो नाम उसने लिए थे जड़ी-बूटियों के, आशा भी नहीं हो सकती थी कि कायसी को उनका पता हो, क्योंकि वह किसी चिकित्सा से कभी कोई उसका संबंध नहीं था। चिकित्सकों ने कहा: और तो करने का कोई उपाय नहीं है, यह निपट पागलपन मालूम पड़ता है, क्योंकि ये जड़ी-बूटियां इस तरह का काम करेंगी, यह हमको भी पता नहीं है। लेकिन जब कोई उपाय न हो, तो हर्ज कुछ भी नहीं है। वे जड़ी-बूटियां खोजी गईं। जैसा बताया था कायसी ने, वैसा बना कर उसे दिया गया। बारह घंटे में वह होश में आ गया, और बिलकुल ठीक हो गया। और होश में आकर वह न बता सका कि उसने ऐसी कोई बात कही थी या उन दवाइयों के नाम भी न पहचान सका, वे जो जड़ी-बूटियां उसने कही थीं, कि मैं इनके नाम भी पहचानता हूं। उसने कहा: यह हो ही कैसे सकता है? मुझे तो कुछ पता नहीं।
और तब एक बहुत अनूठी घटना की शुरुआत हुई। फिर तो कायसी इसमें कुशल हो गया, और उसने अमरीका में तीस हजार लोगों को अपने पूरे जीवन में ठीक किया। और जो भी निदान उसने किया वह सदा ठीक निकला, और जो मरीज उससे निदान लिया वह सदा ठीक हुआ, निरपवाद रूप से। लेकिन कायसी खुद भी नहीं समझा सकता था कि उसे होता क्या है। इतना ही कह सकता था कि जब भी मैं आंख बंद करता हूं कोई निदान खोजने के लिए, मेरी दोनों आंखें ऊपर चढ़ जाती हैं। मुझे ऐसा लगता है कि कोई मेरी पुतलियों को ऊपर खींचे जा रहा है। और फिर मेरी दोनों आंखें भ्रू-मध्य में ठहर जाती हैं। और तब मैं इस लोक को भूल जाता हूं। फिर मुझे पता नहीं क्या होता है। इसे मैं भूलता हूं, इसका मुझे पता है। दूसरा क्या होता है, उसका मुझे कोई पता नहीं। लेकिन जब तक मैं इसको नहीं भूल जाता, तब तक वह जो निदान मैं देता हूं वह नहीं आता है। निदान उसने ऐसे-ऐसे दिए कि एक-दो निदान सोच लेने जैसे हैं।
रथचाइल्ड अमरीका का एक बहुत बड़ा करोड़पति, अरबपति परिवार है। उस परिवार की एक महिला बीमार थी और कोई इलाज नहीं बचा था, सब इलाज हो गए थे। फिर कायसी के पास उसको लाया गया। कायसी ने एक दवा का नाम दिया अपनी बेहोशी में। हमारी तरफ से हम कहेंगे बेहोशी, जो जानते हैं उनकी तरफ से तो वह हमसे बड़े होश में है, जो जानते हैं उनके लिहाज से तो हम बेहोश हैं। सच तो यह है कि जब तक तीसरी आंख तक ज्ञान न पहुंचे, तब तक बेहोशी जारी रहती है। पर हमारी तरफ से कायसी ने आंख बंद कीं, वह बेहोश हुआ, और उसने एक दवा का नाम बताया।
रथचाइल्ड तो अरबपति परिवार था। सारे अमरीका में खोज-बीन की गई, वह दवा कहीं मिली नहीं। कोई यह भी न बता सका कि इस तरह की कोई दवा है भी। फिर सारी दुनिया के अखबारों में विज्ञापन दिया गया कि कहीं से भी इस नाम की दवा मिले। कोई बीस दिन बाद स्वीडन से एक आदमी ने जवाब दिया कि इस नाम की दवा है नहीं; बीस साल पहले मेरे पिता ने इस नाम की दवा पेटेंट करवाई थी, लेकिन फिर कभी बनाई नहीं। वह सिर्फ पेटेंट है, कभी बाजार में आई नहीं। दवा भी हमारे पास नहीं है, पिता मर चुके हैं, और वह प्रयोग कभी सफल हुआ नहीं। सिर्फ फार्मूला हमारे पास है, वह हम पहुंचा देते हैं। वह फार्मूला पहुंचाया गया, वह दवा बनी, और वह स्त्री ठीक हो गई। लेकिन वह दवा कहीं थी नहीं दुनिया के बाजार में कि जिसका कायसी को पता हो सके।
दूसरी एक घटना में उसने एक दवा का नाम लिया। बहुत खोज-बीन की गई, वह दवा नहीं मिल सकी। साल भर बाद अखबारों में उस दवा का विज्ञापन निकला। वह दवा उस वक्त बन रही थी किसी प्रयोगशाला में जब उसने कहा था, तब तक उसका नाम भी तय नहीं हुआ था। पर जो नाम उसने साल भर पहले दिया था उस नाम की दवा साल भर बाद बाहर आई। और उसी दवा से वह मरीज ठीक हुआ।
और कई बार तो उसने दवाएं बताईं जो खोजी नहीं जा सकीं और मरीज मर गए। और वह भी कहता था, मैं कुछ कर नहीं सकता, मेरे हाथ की बात नहीं है। मुझे पता नहीं कि जब मैं बेहोश होता हूं तब कौन बोलता है, कौन देखता है, मुझे कुछ पता नहीं। मुझमें और उस व्यक्तित्व में कोई भी संबंध नहीं है। पर एक बात तय थी कि कायसी जब भी बोलता तब उसकी दोनों आंखें चढ़ गई होती थीं।
आप भी जब गहरी नींद में सोते हैं तो आपकी दोनों आंखें, जितनी गहरी नींद होती है, उतनी ऊपर चली जाती हैं। अब अभी तो बहुत से मनोवैज्ञानिक नींद पर बहुत से प्रयोग कर रहे हैं। तो आपकी आंख की पुतली कितनी ऊपर गई है, इससे ही तय किया जाता है कि आप कितनी गहरी नींद में हैं। जितनी आंख की पुतली नीचे होती है उतनी गतिमान होती है ज्यादा, मूवमेंट होता है। और आंख की पुतली में जितनी गति होती है उतनी तेजी से आप सपना देख रहे होते हैं।
यह सब सिद्ध हो चुका है वैज्ञानिक परीक्षणों से। उसको वैज्ञानिक कहते हैं आर ई एम, रैम, रैपिड आई मूवमेंट। तो रैम की कितनी मात्रा है, उससे ही तय होता है कि आप कितनी गति का सपना देख रहे हैं। और आंख की पुतली जितनी नीची होती है, रैम की मात्रा उतनी ही ज्यादा होती है; जितनी ऊपर चढ़ने लगती है, रैम, वह जो आंख की तीव्र गति है पुतलियों की, वह कम होने लगती है। और जब बिलकुल थिर हो जाती है आंख वहां जाकर जहां कि दोनों आंखें मध्य में देखती हैं ऐसी प्रतीत होती हैं, वहां जाकर रैम बिलकुल ही बंद हो जाता है, बिलकुल! पुतली में कोई तरह की गति नहीं रह जाती।
वह जो अगति है पुतली की वही गहन से गहन निद्रा है। योग कहता है कि गहरी सुषुप्ति में हम वहीं पहुंच जाते हैं जहां समाधि में। फर्क इतना ही होता है कि सुषुप्ति में हमें पता नहीं होता, समाधि में हमें पता होता है। गहरी सुषुप्ति में आंख जहां ठहरती है वहीं गहरी समाधि में भी ठहरती है। क्रमशः………..
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३