उत्सव हमारी प्राकृतिक अवस्था है: उत्सव मनाना – उतना ही स्वाभाविक जितना पेड़ों का फूलना, पक्षियों का गाना, नदियों का समुद्र की ओर बहना

 उत्सव हमारी प्राकृतिक अवस्था है: उत्सव मनाना – उतना ही स्वाभाविक जितना पेड़ों का फूलना, पक्षियों का गाना, नदियों का समुद्र की ओर बहना

ओशो- उत्सव किसी इच्छा की पूर्ति के कारण नहीं है। इच्छा केवल वर्तमान क्षण से बचने का एक तरीका है। इच्छा भविष्य का निर्माण करती है और आपको दूर ले जाती है। इच्छा एक नशा है। यह आपको मदहोश रखती है और वास्तविकता को देखने नहीं देती – जो यहीं और अभी है।उत्सव का अर्थ है इस पूरे बनने की यात्रा को छोड़ देना और बस यहीं होना। जब बनने की यह प्रक्रिया गायब हो जाती है, तो बनने का सारा धुआं मिट जाता है और अस्तित्व की ज्योति प्रकट होती है। और वही ज्योति उत्सव है।उत्सव का कोई कारण नहीं होता। उत्सव सिर्फ इसलिए होता है क्योंकि हम हैं। हम जिस पदार्थ से बने हैं, वह उत्सव ही है। यह हमारी प्राकृतिक अवस्था है: उत्सव मनाना – उतना ही स्वाभाविक जितना पेड़ों का फूलना, पक्षियों का गाना, नदियों का समुद्र की ओर बहना। उत्सव एक प्राकृतिक अवस्था है।इसका आपकी इच्छाओं और उनकी पूर्ति, आपकी उम्मीदों और उनकी पूर्ति से कोई लेना-देना नहीं है; यह पहले से ही विद्यमान है। लेकिन उस उत्सव को देखने के लिए जो पहले से ही आपके अस्तित्व के सबसे गहरे स्तर पर हो रहा है, आपको ‘बनने’ की प्रक्रिया छोड़नी होगी। आपको ‘बनने’ की व्यर्थता को समझना होगा।एक सच्चा जीवन मृत्यु और पुनर्जन्म का होता है। हर क्षण यह होता है, हर क्षण आपको अतीत से मरना होता है। केवल तभी वर्तमान उपलब्ध होता है, और तब उत्सव होता है, तब महान आनंद होता है, तब महान पुष्पित अवस्था होती है। और आप पूरी तरह से वर्तमान में तभी हो सकते हैं जब आपके अंदर कहीं और होने की कोई इच्छा न हो, जब आपके अंदर कोई और होने की इच्छा न हो। इसे मैं “ज्ञान” कहता हूं।

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३