“आधुनिक मनुष्‍य की साधना” कचरे को दबा लेने से कोई मुक्ति नहीं होती, उसे झाड़—बुहारकर बाहर कर देना जरूरी इसलिए ध्यान के लिए सक्रिय ध्यान विधियां अत्यंत महत्वपूर्ण “ओशो”

 “आधुनिक मनुष्‍य की साधना” कचरे को दबा लेने से कोई मुक्ति नहीं होती, उसे झाड़—बुहारकर बाहर कर देना जरूरी इसलिए ध्यान के लिए सक्रिय ध्यान विधियां अत्यंत महत्वपूर्ण “ओशो”

ओशो- एक मित्र ने पूछा है, क्या बंदरों की तरह उछल—कूद से ध्यान उपलब्ध हो सकेगा?क्‍यों कि आप बंदर हैं, इसलिए बिना उछल—कूद के आपके भीतर के बंदर से छुटकारा नहीं है। यह ध्यान के कारण उछल—कूद की जरूरत नहीं है, आपके बंदरपन के कारण है।

जो आपके भीतर छिपा है, उसे जन्मों—जन्मों तक दबाए रहें, तो भी उससे छुटकारा नहीं है। उसे झाडू ही देना होगा, उसे बाहर फेंक ही देना होगा। कचरे को दबा लेने से कोई मुक्ति नहीं होती। उसे झाड़—बुहारकर बाहर कर देना जरूरी है।बंदर को शांत करने के दो रास्ते हैं, एक रास्ता है कि जोर—जबरदस्ती से उसे बिठा दो, डंडे के डर से कि हिलना मत, डुलना मत, नाचना मत, कूदना मत। ऊपर से बंदर अपने को सम्हाल लेगा, लेकिन भीतर के बंदर का क्या होगा? ऊपर से बंदर अपने को रोक लेगा, लेकिन भीतर और शक्ति इकट्ठी हो जाएगी। और अगर इस तरह बंदर को दबाया, तो बंदर पागल हो जाएगा। बहुत लोग इसी तरह पागल हुए हैं। पागलखाने उनसे भरे पड़े हैं। क्योंकि भीतर जो शक्ति थी, उसने उसको जबरदस्ती दबा लिया, वह शक्ति विस्फोटक हो गई है।एक रास्ता यह है कि बंदर को नचाओ, कुदाओ, दौड़ाओ। बंदर थक जाएगा और शांत होकर बैठ जाएगा। वह शांति अलग होगी; ऊपर से दबाकर आ गई शांति अलग होगी।

आज मनोविज्ञान इस बात को बड़ी गहराई से स्वीकार करता है कि आदमी के भीतर जो भी मनोवेग हैं, उनका रिप्रेशन, उनका दमन खतरनाक है। उनकी अभिव्यक्ति योग्य है।लेकिन अभिव्यक्ति का मतलब किसी पर क्रोध करना नहीं है, किसी पर हिंसा करना नहीं है। अभिव्यक्ति का अर्थ है, बिना किसी के संदर्भ में मनोवेग को आकाश में समर्पित कर देना। और जब मनोवेग समर्पित हो जाता है और भीतर की दबी हुई शक्ति छूट जाती है, मुक्त हो जाती है, तो एक शांति भीतर फलित होती है। उस शांति में ध्यान की तरफ जाना आसान है।

यह उछल—कूद ध्यान नहीं है। लेकिन उछल—कूद से आपके भीतर की उछल—कूद थोड़ी देर को फिंक जाती है, बाहर हट जाती है। उस मौन के क्षण में, जब बंदर थक गया है, भीतर उतरना आसान है।जो लोग आधुनिक मनोविज्ञान से परिचित हैं, वे इस बात को बहुत ठीक से समझ सकेंगे। पश्चिम में अभी एक नई थैरेपी, एक नया मनोचिकित्सा का ढंग विकसित हुआ है। उस थैरेपी का नाम है, स्कीम थैरेपी। और पश्चिम के बड़े से बड़े मनोवैज्ञानिक उसके परिणामों से आश्चर्यचकित रह गए हैं। इस थैरेपी, इस चिकित्सा की मूल खोज यह है कि बचपन से ही प्रत्येक व्यक्ति अपने रोने के भाव को दबा रहा है। रोने का उसे मौका नहीं मिला है। पैदा होने के बाद पहला काम बच्चा करता है, रोने का। आपको पता है, अगर आप उसको भी दबा दें, तो बच्चा मर ही जाएगा।

पहला काम बच्चा करता है रोने का, क्योंकि रोने की प्रक्रिया में ही उसकी श्वास चलनी शुरू होती है। अगर हम उसे वहीं रोक दें कि रो मत, तो वह मरा हुआ ही रहेगा, वह जिंदा ही नहीं हो पाएगा। इसलिए बच्चा पैदा हो और अगर न रोए, तो मां—बाप चिंतित हो जाएंगे, डाक्टर परेशान हो जाएगा। रुलाने की कोशिश की जाएगी कि वह रो ले, क्योंकि रोने से उसकी जीवन प्रक्रिया शुरू होगी। लेकिन बच्चे को तो हम रोकते भी नहीं।

लेकिन जैसे—जैसे बच्चा बढ़ने लगता है, हम उसके रोने की प्रक्रिया को रोकने लगते हैं। हमें इस बात का पता नहीं है कि इस जगत में ऐसी कोई भी चीज नहीं है, जिसका जीवन के लिए कोई उपयोग न हो। अगर उपयोग न होता, तो वह होती ही न।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि बच्चे के रोने की जो कला है, वह उसके तनाव से मुक्त होने की व्यवस्था है। और बच्चे पर बहुत तनाव हैं। बच्चे को भूख लगी है और मां दूर है या मां काम में उलझी है। बच्चे को भी क्रोध आता है। और अगर बच्चा रो ले, तो उसका क्रोध बह जाता है और बच्चा हलका हो जाता है। लेकिन मां उसे रोने नहीं देगी।मनसविद कहते हैं कि उसे रोने देना; उसे प्रेम देना, लेकिन उसके रोने को रोकने की कोशिश मत करना। हम क्या करेंगे? बच्चे को खिलौना पकड़ा देंगे कि मत रोओ। बच्चे का मन डाइवर्ट हो जाएगा। वह खिलौना पकड़ लेगा। लेकिन रोने की जो प्रक्रिया भीतर चल रही थी, वह रुक गई। और जो आंसू बहने चाहिए थे, वे अटक गए। और जो हृदय हलका हो जाता बोझ से, वह हलका नहीं हो पाया। वह खिलौने से खेल लेगा, लेकिन यह जो रोना रुक गया, इसका क्या होगा? यह विष इकट्ठा हो रहा है।

मनसविद कहते हैं कि बच्चा इतना विष इकट्ठा कर लेता है, वही उसकी जिंदगी में दुख का कारण है। और वह उदास रहेगा। आप इतने उदास दिख रहे हैं, आपको पता नहीं कि यह उदासी हो सकता था न होती; अगर आप हृदयपूर्वक जीवन में रोए होते, तो ये आंसू आपकी पूरी जिंदगी पर न छाते; ये निकल गए होते। और सब तरह का रोना थैराप्यूटिक है। हृदय हलका हो जाता है। रोने में सिर्फ आंसू ही नहीं बहते, भीतर का शोक, भीतर का क्रोध, भीतर का हर्ष, भीतर के मनोवेग भी आंसुओ के सहारे बाहर निकल जाते हैं। और भीतर कुछ इकट्ठा नहीं होता है।

तो स्कीम थैरेपी के लोग कहते हैं कि जब भी कोई आदमी मानसिक रूप से बीमार हो, तो उसे इतने गहरे में रोने की आवश्यकता है कि उसका रोआं—रोआं, उसके हृदय का कण—कण, श्वास, धड़कन— धड़कन रोने में सम्मिलित हो जाए; एक ऐसे चीत्कार की जरूरत है, जो उसके पूरे प्राणों से निकले, जिसमें वह चीत्कार ही बन जाए।

हजारों मानसिक रोगी ठीक हुए हैं चीत्कार से। और एक चीत्कार भी उनके न मालूम कितने रोगों से उन्हें मुक्त कर जाती है। लेकिन उस चीत्कार को पैदा करवाना बड़ी कठिन बात है। क्योंकि आप इतना दबाए हैं कि आप अगर रोते भी हैं, तो रोना भी आपका झूठा होता है। उसमें आपके पूरे प्राण सम्मिलित नहीं होते। आपका रोना भी बनावटी होता है। ऊपर—ऊपर रो लेते हैं। आंख से ही आंसू बह जाते हैं, हृदय से नहीं आते। लेकिन चीत्कार ऐसी चाहिए, जो आपकी नाभि से उठे और आपका पूरा शरीर उसमें समाविष्ट हो जाए। आप भूल ही जाएं कि आप चीत्कार से अलग हैं, आप एक चीत्कार ही हो जाएं।

तो कोई तीन महीने लगते हैं मनोवैज्ञानिकों को, आपको रुलाना सिखाने के लिए। तीन महीने निरंतर प्रयोग करके आपको गहरा किया जाता है।

करते क्या हैं इस थैरेपी वाले लोग? आपको छाती के बल लिटा देते हैं जमीन पर। और आपसे कहते हैं कि जमीन पर लेटे रहें और जो भी दुख मन में आता हो, उसे रोकें मत, उसे निकालें। रोने का मन हो, रोएं; चिल्लाने का मन हो, चिल्लाएं।

तीन महीने तक ऐसा बच्चे की भांति आदमी लेटा रहता है जमीन पर रोज घंटे, दो घंटे। एक दिन, किसी दिन वह घड़ी आ जाती है कि उसके हाथ—पैर कंपने लगते हैं विद्युत के प्रवाह से। वह आदमी आंख बंद कर लेता है, वह आदमी जैसे होश में नहीं रह जाता, और एक भयंकर चीत्कार उठनी शुरू होती है। कभी—कभी घंटों वह चीत्कार चलती है। आदमी बिलकुल पागल मालूम पड़ता है। लेकिन उस चीत्कार के बाद उसकी जो—जो मानसिक तकलीफें थीं, वे सब तिरोहित हो जाती हैं।यह जो ध्यान का प्रयोग मैं आपको कहा हूं ये आपके जब तक मनोवेग—रोने के, हंसने के, नाचने के, चिल्लाने के, चीखने के, पागल होने के—इनका निरसन न हो जाए, तब तक आप ध्यान में जा नहीं सकते। यही तो बाधाएं है।

आप शांत होने की कोशिश कर रहे हैं और आपके भीतर वेग भरे हुए हैं, जो बाहर निकलना चाहते हैं। आपकी हालत ऐसी है, जैसे केतली चढ़ी है चाय की। ढक्कन बंद है। ढक्कन पर पत्थर रखे हैं। केतली का मुंह भी बंद किया हुआ है और नीचे से आग भी जल रही है। वह जो भाप इकट्ठी हो रही है, वह फोड़ देगी केतली को। विस्फोट होगा। दस—पांच लोगों की हत्या भी हो सकती है।

इस भाप को निकल जाने दें। इस भाप के निकलते ही आप नए हो जाएंगे और तब ध्यान की तरफ प्रयोग शुरू हो सकता है।

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३ 

गीतादर्शन अ.12, आधुनिक मनुष्‍य की साधना