राजनैतिक दलों के होते लोकतंत्र नहीं आ सकता “ओशो”

 राजनैतिक दलों के होते लोकतंत्र नहीं आ सकता  “ओशो”

आपका राजनीति पर क्या कहना है?

ओशो- क्या मुझे कहने की जरूरत है? मैं इसे अभिशाप देता हूँ। यह दुर्घटना है जिसके कारण हम सदियों से दुख भोग रहे हैं। राजनीति की कतई जरूरत नहीं है। परंतु राजनेता इसे गैरजरूरी नहीं होने देंगे क्योंकि तब वे राष्ट्रपति खो देंगे, उनका व्हाइट हाउस, उनके राजभवन उनके प्रधानमंत्री सब विदा हो जाएँगे।राजनीति की जरूरत नहीं है, यह पूरी तरह से समय बाह्म बात है। इनकी जरूरत थी क्योंकि देश लगातार लड़ रहे हैं। तीन हजार सालों में पाँच हजार युद्ध लड़े गए हैं।

यदि हम देशों की सीमाएँ समाप्त कर देते हैं- जो कि मात्र नक्शों पर होती हैं न कि जमीन पर- कौन राजनीति की परवाह करेगा? हाँ, विश्व सरकार होगी परंतु यह सरकार सिर्फ कार्यकारी होगी। इसकी अलग से कोई प्रतिष्ठा नहीं होगी, क्योंकि वहाँ किसी के साथ किसी प्रकार की प्रतियोगिता नहीं होगी। यदि तुम विश्व सरकार के राष्ट्रपति हो तो क्या हुआ? तुम किसी तरह से किसी दूसरे से ऊँचे नहीं हो।कार्यकारी सरकार का मतलब है जिस तरह से रेलवे चलती है। रेलवे का कौन प्रधान है इसकी कौन परवाह करता है? जैसे कि डाक विभाग चलता है और पूरी तरह से चलता है, डाक विभाग का प्रधान कौन है इसकी कौन चिंता लेता है?

देशों को विदा करना होगा और देशों के विदा होने के साथ ही राजनीति स्वत: विदा हो जाएगी, वह आत्महत्या कर लेगी। कार्यकारी सरकार में जो जरूरी है वही रहेगा। वह रोटरी क्लब की तरह बनाई जा सकती है, तो कभी काला व्यक्ति प्रधान होगा, कभी स्त्री प्रधान होगी, कभी चीनी प्रधान होगा, कभी रशियन प्रधान होगा, कभी अमेरिकन प्रधान होगा- परंतु वह चक्र की तरह घूमता रहेगा।शायद छह माह से अधिक एक व्यक्ति को नहीं दिया जाना चाहिए, इससे अधिक खतरनाक है। तो छह माह के लिए प्रधान बनो और उसके बाद हमेशा के लिए खो जाओ। और कोई व्यक्ति फिर से नहीं चुना जाना चाहिए। यह मात्र दिमाग का दिवालियापन है कि एक ही व्यक्ति को बार-बार प्रधानमंत्री के लिए ‍चुना जाए। क्या तुम इसमें दिमागी दिवालियापन नहीं देखते हो? तुम्हारे पास कोई और बुद्धिमान व्यक्ति नहीं है? तुम्हारे पास मात्र एक ही मूर्ख है?

इस दुनिया में किसी राजनैतिक दल की कोई जरूरत नहीं है। व्यक्ति व्यक्ति के बारे में तय करे। किसी राजनैतिक दल की कोई जरूरत नहीं है। यह लोकतंत्र के लिए बहुत विध्वंसात्मक है। यद्यपि लोग कहते हैं कि लोकतंत्र राजनैतिक दलों के बिना नहीं हो सकता, मैं तुमसे कहना चाहता हूँ कि राजनैतिक दलों के होते लोकतंत्र नहीं आ सकता, क्योंकि उनके अपने निहित स्वार्थ हैं।प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र है किसी भी पद के लिए या किसी भी व्यक्ति को चुनने के लिए। और जो भी व्यक्ति आएगा वह तुम्हारे प्रधानमंत्री से अधिक बुद्धिमान होगा। चूँकि वह उस पद पर सिर्फ छह माह के लिए है तो वह अपने समय को इस विश्वविद्यालय का उद्‍घाटन या उस पुलिया का उद्‍घाटन, इस सड़क का उद्‍घाटन या सभी तरह की नासमझियों के उद्‍घाटन में जाया नहीं करेगा। और संसद में सांसद सभी तरह की नासमझियों व अर्थहीन बातों पर बहसें किए चले जा रहे हैं मानो उनके पास अनंत समय हो। एक छोटा से मसौदा स्वीकृत होने में सालों लग जाते हैं।

एक व्यक्ति जिसके पास मात्र छह महीने हैं वह इस तरह की नासमझियों में समय व्यर्थ नहीं कर सकता। वह वैज्ञानिक सलाहकार विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को रखेगा। उदाहरण के लिए अर्थव्यवस्था के लिए वह दुनिया के सभी अर्थशास्त्रियों से सलाह लेगा। उसके पास बहुत समय नहीं है। वह तृतीय श्रेणी के राजनेताओं को साथ नहीं रख सकता जो सिवाय झूठ बोलने के कुछ नहीं जानते। यदि उसे शिक्षा के बारे में कुछ तय करना है तो वह दुनिया के महान शिक्षा शास्त्रियों से सलाह लेगा परंतु अभी तो आश्चर्यजनक चीजें हो रही हैं…।भारत में, जब मैं था, उस समय वहाँ की सरकार में जो व्यक्ति केंद्रीय शिक्षामंत्री था मैं उस व्यक्ति को जानता हूँ। मैंने कई नालायक देखे हैं, परंतु वह सिर्फ नंबर एक था…वह शिक्षामंत्री है। वह पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था के बारे में तय करेगा।

परंतु उसने कुछ भी तय नहीं किया। नौकरशाही उसी ढर्रे पर चलती रही। वे टुच्चे खेल खेलते रहे, पीठ में छुरा भोंकना, टाँग खींचना, शीर्ष पर पहुँचने के लिए सब तरह की जुगाड़ लगाना। मैं सूत्र देता हूँ: एक विश्व।

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३ 
दि लास्ट टेस्टामेंट