दूसरे को सताना अगर हिंसा है, तो खुद को सताना अहिंसा कैसे हो सकती है? “ओशो”

 दूसरे को सताना अगर हिंसा है, तो खुद को सताना अहिंसा कैसे हो सकती है? “ओशो”

ओशो- भागने की कोई भी जरूरत नहीं है तुम जहां हो, वहीं रहना; रत्तीभर भी बाहर कोई फर्क करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन भीतर तुम अकेले हो जाना। भीतर तुम कैवल्य को अनुभव करना कि मैं अकेला हूं; कोई संगी—साथी नहीं है। और यह तुम दोहराना मत, क्योंकि दोहराने की कोई जरूरत नहीं कि रोज सुबह बैठकर तुम दोहराओ कि मैं अकेला हूं कोई संगी—साथी नहीं है। इससे कुछ भी न होगा। यह दोहराना तो सिर्फ यही बताएगा कि तुम्हें अभी खयाल नहीं हुआ। इसे समझना।यह तथ्य है कि तुम अकेले हो। समझने में अड़चन है— वही तपश्रर्या है। तप का अर्थ नहीं है कि तुम धूप में खड़े हो जाओ। आदमी को छोड्कर सभी पशु—पक्षी धूप में खड़े हैं। उनमें से कोई भी मोक्ष नहीं चला जा रहा है। और तप का अर्थ यह नहीं है कि तुम भूखे खड़े हो जाओ, अनशन कर लो, उपवास कर लो; क्योंकि आधी दूनियां वैसे ही भूखी मर रही है। कोई उपवास करके मोक्ष नहीं पहुंच जाता है। शरीर को गला दो, जला दो— उससे कुछ हल नहीं है। वह सिर्फ आत्म—हिंसा है और महानतम पाप है। और सिर्फ छू उस पाप में उतरते हैं। जिन्हें थोड़ा भी बोध है, वे ऐसी नासमझियां न करेंगे।दूसरे को भूखा मारना अगर गलत है तो खुद को भूखा मारना सही कैसे हो सकता है? दूसरे को सताना अगर हिंसा है, तो खुद को सताना अहिंसा कैसे हो सकती है? सताने में हिंसा है। किसको तुम सताते हो इससे क्या फर्क पड़ता है! जो हिम्मतवर हैं वे दूसरे को सताते हैं; जो कमजोर हैं वे खुद को सताते हैं। क्योंकि दूसरे को सताने में एक खतरा है, दूसरा बदला लेगा। खुद को सताने में वह खतरा भी नहीं है। कौन बदला लेगा? कमजोर अपने को सताते हैं।तुमने कभी खयाल किया है— अगर पुरुष नाराज हो जाए तो वह पली को पीटता है, और अगर पत्नी नाराज हो तो वह खुद को पीटती है। यह जो पत्नी है, यह साधुओं का प्रतीक है। कमजोर अपने को पीट लेता है। क्या करे? ताकतवर दूसरे को पीटता है; क्योंकि उसमें खतरा तो है ही कि दूसरा क्या करेगा, कौन जाने! कमजोर आत्म—हिंसक हो जाता है, और ताकतवर पर—हिंसक होता है। और धार्मिक वह है जो अहिंसक है— न वह दूसरे को सताता है, न खुद को सताता है। सताने की बात व्यर्थ है।तपश्रर्या का अर्थ है कि तुमने यह सत्य स्वीकार कर लिया कि तुम अकेले हो, कोई उपाय नहीं है संगी—साथी का। तुम कितना ही चाहो— कितना ही आंखें बंद करो, सपने देखो— तुम अकेले ही रहोगे। जन्मों—जन्मों से तुमने घर बसाये, परिवार बसाये, मिटाये; लेकिन तुम अकेले ही रहे हो। तुम्हारे अकेलेपन में रत्तीभर भी फर्क नहीं पड़ता। जिसने यह जान लिया— स्वीकार कर लिया— कि मैं अकेला हूं उसके लिए इंगित है इस सूत्र में ‘चैतन्य आत्मा है।’ वही तुम्हारा है और कोई तुम्हारा नहीं है।

🍁🍁ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३ 🍁🍁
शिव–सूत्र-प्रवचन–01