ओशो- कृष्ण का उत्तर अर्जुन ही पा सकता है। इसलिए गीता बहुत लोग पढ़ते हैं, कृष्ण का उत्तर उन्हें मिलता नहीं। क्योंकि कृष्ण का उत्तर पाने के लिए अर्जुन की चेतना चाहिए।इसलिए मैं नहीं चाहता कि मेरे संन्यासी भाग जाएं पहाड़ों में। जीवन के युद्ध में ही खड़े रहें, जहां सब दाव पर लगा है, भगोड़ापन न दिखाएं, पलायन न करें, जीवन से पीठ न मोडे; आमने—सामने खड़े रहें। और उस जीवन के संघर्ष में ही उठने दें जिज्ञासा को। तो तुम्हें किसी दिन कृष्ण का उत्तर मिल सकता है। पर अर्जुन की चेतना चाहिए; युद्ध चाहिए चारों तरफ।और युद्ध है। तुम जहां भी हो—बाजार में, दुकान में, दफ्तर में, घर में—युद्ध है। प्रतिपल युद्ध चल रहा है, अपनों से ही चल रहा है। इसलिए कथा बड़ी मधुर है कि उस तरफ भी, अर्जुन के विरोध में जो खड़े हैं, वे ही अपने ही लोग हैं, भाई हैं, चचेरे भाई हैं, मित्र हैं, सहपाठी हैं, संबंधी हैं।
अपनों से ही युद्ध हो रहा है। पराया तो यहां कोई है ही नहीं। जिससे भी लड़ रहे हो, वह भी अपना ही है; दूर का, पास का, कोई नाता—रिश्ता है। सारा जीवन ही संबंधी है। यह पूरा जीवन ही परिवार है और परिवार ही बंटा है और लड़ रहा है। युद्ध दुश्मनों के बीच में नहीं है, युद्ध अपनों के ही बीच में है। युद्ध में तुम किसी और को न मारोगे, अपनों को ही मारोगे। युद्ध में तुम अपनों से ही मारे जाओगे।पराए होते, कठिनाई न थी; दुश्मन होते, कठिनाई न थी। अर्जुन के मन में द्वंद्व खड़ा हो गया है, सब अपने हैं। और इनको मारकर क्या पाऊंगा? क्या मिलेगा?
अर्जुन भागना चाहता है। वह चाहता है, किसी ऋषि की कुटी में चला जाए; अरण्य में वास करे; शांत बैठे; ध्यान में डूबे। उसके मन में बड़ा विराग उठा है। लेकिन कृष्ण उसे खींचते हैं, भागने नहीं देते। उसके मन में विराग उठा है, वह जंगल जाना चाहता है। कृष्ण उसे युद्ध के मैदान में रोके रखते हैं।कृष्ण का प्रयोजन क्या है? वे क्यों समझा रहे हैं कि तू रुक; भाग मत! क्योंकि जो भाग गया स्थिति से, वह कभी भी स्थिति के ऊपर नहीं उठ पाता। जो परिस्थिति से पीठ कर गया, वह हार गया। भगोड़ा यानी हारा हुआ। जीवन ने एक अवसर दिया है पार होने का, अतिक्रमण करने का। अगर तुम भाग गए, तो तुम अवसर खो दोगे।
भागों मत, जागो। भागो मत, रुको। ज्यादा जागरूक, ज्यादा सचेतन बनो; ज्यादा जीवंत बनो, ज्यादा ऊर्जावान बनो, ज्यादा विवेक, ज्यादा भीतर की मेधा उठे। तुम्हारी मेधा इतनी हो जाए कि समस्याएं नीचे छूट जाएं।
समस्याओं से भागकर तुम समस्याओं से छोटे रह जाओगे। उनसे लड़कर उठो। उनको सीढ़ियां बनाओ। जिनको तुमने पत्थर समझा है मार्ग का, वे पत्थर ही हैं, ऐसा मत समझो, वे सीढ़ियां भी बन सकते हैं। उन पर पैर रखो और तुम ऊंचाई पर पहुंचोगे।कृष्ण ने भागने न दिया अर्जुन को और जगत को संन्यास का पहला ठीक—ठीक संदेश दिया है। वैसा संदेश बुद्ध से भी नहीं मिला, महावीर से भी नहीं मिला; क्योंकि उन सब ने भागने वाले को स्वीकार कर लिया। कृष्ण की व्यवस्था जटिल है, लेकिन बड़ी बहुमूल्य है।
और इसलिए मैं राजी हुआ गीता पर बोलने को, क्योंकि गीता में मनुष्य का भविष्य छिपा है। अब न तो महावीर का संन्यासी बच सकता है दुनिया में, न बुद्ध का संन्यासी बच सकता है। दुनिया ही न रही वह; भगोड़ों का उपाय ही न रहा। अब तो सिर्फ कृष्ण का संन्यासी बच सकता है दुनिया में। जो भागता नहीं है, जो पैर जमाकर खड़ा हो जाता है, जो हर परिस्थिति का उपयोग कर लेता है, विपरीत परिस्थिति का भी उपयोग कर लेता है, जो युद्ध के बीच में ध्यान को उपलब्ध होता है।
यही तो कला है। भागकर शांत हो जाने में कला भी क्या है?
🍁🍁ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३ 🍁🍁 गीता दर्शन–भाग–8 सत्य की खोज और त्रिगुण का गणित अध्याय—17—(प्रवचन—पहला)