मैंने सुना है कि एक बूढ़ा आदमी अपनी तिजोरी में पांच सोने की ईंटें रखे था। उसका बेटा जरा फक्कड़ तबीयत का था–मस्ती-मौज…। उसने धीरे-धीरे वे पांचों ईंटें खिसका लीं। मजा कर लिया। और हर ईंट की जगह उसने एक लोहे की ईंट उसी वजन की रख दी। बाप को बुढ़ापे में दिखाई भी कम पड़ता था, और अंधेरे में तिजोरी थी। वह उसको ऐसा खोल कर, हाथ फेर कर देख लेता था। ईंट थी, बात खत्म थी। दरवाजा लगा कर प्रसन्न था।