प्रश्न: पुराण-कथा है, प्रह्लाद नास्तिक राजा हिरण्यकश्यप के यहां जन्म लेता है, और फिर हिरण्यकश्यप अपनी नास्तिकता सिद्ध करने के लिए प्रह्लाद को नदी में डुबोता है, पहाड़ से गिरवाता है, और अन्त में अपनी बहन होलिका से पूर्णिमा के दिन जलवाता है। और आश्चर्य तो यही है कि वह सभी जगह बच जाता है, […]Read More
ओशो- एक मित्र ने पूछा है, क्या बंदरों की तरह उछल—कूद से ध्यान उपलब्ध हो सकेगा?क्यों कि आप बंदर हैं, इसलिए बिना उछल—कूद के आपके भीतर के बंदर से छुटकारा नहीं है। यह ध्यान के कारण उछल—कूद की जरूरत नहीं है, आपके बंदरपन के कारण है। जो आपके भीतर छिपा है, उसे जन्मों—जन्मों तक दबाए […]Read More
ओशो- बुद्ध को राजी कर लिया देवताओं ने, क्योंकि वे तर्क खोज लाए–बुद्ध के लिए तर्क खोजना पड़ा। वे तर्क खोज लाए; उन्होंने सोच-विचार किया, मंत्रणा की, फिर लौटे और उन्होंने कहा, आप ठीक कहते हैं, कि जो समझ सकता है वह आपके बिना भी समझ लेगा; हम राजी। और जो नहीं समझ सकते, उनको […]Read More
‘’छींक के आरंभ में, भय में, खाई-खड्ड के कगार पर, युद्ध से भागने पर, अत्यंत कुतूहल में, भूख के आरंभ में और भूख के अंत में, सतत बोध रखो।‘’ ओशो- यह विधि देखने में बहुत सरल मालूम पड़ती है। छींक के आरंभ में, भय में, चिंता में, भूख के पहले या भूख के अंत में […]Read More
आपका राजनीति पर क्या कहना है? ओशो- क्या मुझे कहने की जरूरत है? मैं इसे अभिशाप देता हूँ। यह दुर्घटना है जिसके कारण हम सदियों से दुख भोग रहे हैं। राजनीति की कतई जरूरत नहीं है। परंतु राजनेता इसे गैरजरूरी नहीं होने देंगे क्योंकि तब वे राष्ट्रपति खो देंगे, उनका व्हाइट हाउस, उनके राजभवन उनके […]Read More
ओशो- भागने की कोई भी जरूरत नहीं है तुम जहां हो, वहीं रहना; रत्तीभर भी बाहर कोई फर्क करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन भीतर तुम अकेले हो जाना। भीतर तुम कैवल्य को अनुभव करना कि मैं अकेला हूं; कोई संगी—साथी नहीं है। और यह तुम दोहराना मत, क्योंकि दोहराने की कोई जरूरत नहीं कि […]Read More
ओशो– एक जैन संत हुए—गणेशवर्णी। वर्षों पहले उन्होंने पत्नी त्याग दी। वे साधु पुरुष थे। कोई बीस वर्ष त्याग के बाद, काशी में थे, तब खबर आई कि पत्नी मर गई। उनके मुंह से जो वचन निकला, वह याद रख लेने जैसा है। उन्होंने कहा, ‘चलो झंझट मिटी।’ उनके भक्तों ने इस वचन का अर्थ […]Read More
ओशो- कृष्ण का उत्तर अर्जुन ही पा सकता है। इसलिए गीता बहुत लोग पढ़ते हैं, कृष्ण का उत्तर उन्हें मिलता नहीं। क्योंकि कृष्ण का उत्तर पाने के लिए अर्जुन की चेतना चाहिए।इसलिए मैं नहीं चाहता कि मेरे संन्यासी भाग जाएं पहाड़ों में। जीवन के युद्ध में ही खड़े रहें, जहां सब दाव पर लगा है, […]Read More
ओशो- अगर स्वयं को न जान पाये, और सब भी जान लिया तो वह सारा ज्ञान भी इकट्ठे जोड़ में अज्ञान सिद्ध होगा। अगर अपने को न देख पाये, और सारा जगत देख डाला, चांद—तारे छान डाले, तो भी तुम अन्य ही रहोगे। क्योंकि आख तो उसी को मिलती है, जो स्वयं को देख लेता […]Read More
जो शिक्षा तुम्हारे भीतर वैयक्तिकता विकसित नहीं करती वह शिक्षा
ओशो– मैं एक ऐसी शिक्षा प्रणाली चाहूंगा, जो तुम्हें उत्तर ने दे बल्कि तुम्हारे प्रश्न अधिक तीव्र करे, तुम्हारी बुद्धि अधिक पैनी करे और तुम्हें एक अखंडता प्रदान करे।-ओशो मैंने सुना है, प्रथम विश्वयुद्ध के बाद मनोवैज्ञानिक ने पहली बार आदमी की बुद्धि नापने की कोशिश की। इस काम के लिए सेना बहुत अच्छी जगह […]Read More