गुरु आशीर्वाद देता है, ऐसा कहना भी ठीक नहीं; गुरु से आशीर्वाद बरसता है,ऐसा ही कहना ठीक है। जैसे दीए से रोशनी झरती है, फूल से गंध बहती है, ऐसा गुरु कुछ करता है, प्रेषित करता है, ऐसा नहीं; तुम्हें कुछ देता है विशेष रूप से, ऐसा नहीं- झर ही रहा है। वह उसके होने का ढंग है। उसने कोई ऊंचाई पाई है, जिस ऊंचाई से झरने नीचे की तरफ बहते ही रहते हैं। अगर तुम तैयार हो तो तुम नहा लोगे। तुम अगर तैयार हो तो जन्मों-जन्मों की धूल बह जाएगी उस स्नान में। तुम अगर तैयार हो तो तुम्हारे मार्ग के कांटे हट जाएंगे और फूलों से भर जाएगा मार्ग।