भिलाई-चरोदा का सियासी महासंग्राम: भाजपा में टिकट के लिए मची होड़, कांग्रेस पर विकास का इम्तिहान… जनता किसे देगी सत्ता की चाबी?

 भिलाई-चरोदा का सियासी महासंग्राम: भाजपा में टिकट के लिए मची होड़, कांग्रेस पर विकास का इम्तिहान… जनता किसे देगी सत्ता की चाबी?

भिलाई-चरोदा। भिलाई-चरोदा नगर निगम चुनाव की आहट के साथ ही शहर का राजनीतिक पारा लगातार चढ़ने लगा है। महापौर की कुर्सी पर कब्जे के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपनी-अपनी रणनीति तेज कर दी है। सबसे ज्यादा हलचल भाजपा खेमे में दिखाई दे रही है, जहां एक-दो नहीं बल्कि कई नेता महापौर पद की टिकट पाने के लिए जोर-आजमाइश में जुटे हैं। वहीं कांग्रेस फिलहाल सीमित चेहरों के साथ चुनावी तैयारी कर रही है, लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पांच वर्षों के कार्यकाल का हिसाब जनता के सामने रखने की होगी।राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भिलाई-चरोदा नगर निगम में महापौर पद का आरक्षण ओबीसी मुक्त होने के बाद भाजपा में दावेदारों की संख्या लगातार बढ़ रही है। साहू समाज से तीन, कुर्मी समाज से तीन, यादव समाज से दो और पटेल समाज से एक प्रमुख दावेदार का नाम चर्चा में है। ऐसे में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसे चेहरे का चयन करना होगा, जो न केवल संगठन बल्कि जनता के बीच भी मजबूत पकड़ रखता हो।भाजपा के सामने एक और महत्वपूर्ण चुनौती यह भी मानी जा रही है कि प्रदेश में करीब ढाई वर्षों से भाजपा की सरकार है और क्षेत्र का विधायक भी भाजपा का है। ऐसे में स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा भी है कि इस अवधि में संगठन के जमीनी कार्यकर्ताओं को कितना महत्व मिला और उनकी अपेक्षाएं किस हद तक पूरी हुईं। माना जा रहा है कि टिकट वितरण के समय यह पहलू भी अहम भूमिका निभा सकता है। यदि टिकट चयन में असंतोष उभरता है तो उसका असर चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है।दूसरी ओर कांग्रेस में फिलहाल महापौर पद के लिए मुख्य रूप से कुर्मी समाज के दो नेताओं के नाम चर्चा में हैं। हालांकि पार्टी अभी खुलकर अपने पत्ते नहीं खोल रही है, लेकिन अंदरखाने चुनावी रणनीति और उम्मीदवार चयन को लेकर मंथन जारी है। कांग्रेस की कोशिश होगी कि संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखते हुए चुनाव मैदान में उतरा जाए।

नगर निगम में वर्तमान में कांग्रेस की सरकार है। ऐसे में विपक्ष नगर विकास, मूलभूत सुविधाओं, अधूरे कार्यों और जनसमस्याओं को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है। वहीं कांग्रेस पिछले पांच वर्षों में कराए गए विकास कार्यों और योजनाओं को जनता के बीच अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करेगी। दूसरी ओर मतदाता भी इस बार विकास, सड़क, पानी, सफाई, अधोसंरचना और नागरिक सुविधाओं को लेकर दोनों दलों से जवाब मांग सकते हैं।वर्तमान में नगर निगम की सत्ता कांग्रेस के पास है। ऐसे में आगामी चुनाव में विपक्ष नगर विकास, अधूरी परियोजनाओं, सड़क, पानी, सफाई, स्ट्रीट लाइट, नाली और अन्य नागरिक सुविधाओं को बड़ा मुद्दा बना सकता है। वहीं कांग्रेस अपने कार्यकाल में किए गए विकास कार्यों को जनता के सामने रखकर दोबारा विश्वास हासिल करने का प्रयास करेगी। इस बार मतदाता केवल वादों पर नहीं, बल्कि पिछले पांच वर्षों के कामकाज के आधार पर भी अपना फैसला दे सकते हैं।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार का चुनाव केवल दलों के बीच मुकाबला नहीं होगा, बल्कि संगठन की मजबूती, उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, सामाजिक समीकरण और स्थानीय मुद्दे भी निर्णायक भूमिका निभाएंगे। भाजपा के लिए टिकट वितरण सबसे बड़ी परीक्षा होगी, जबकि कांग्रेस के लिए अपनी सत्ता विरोधी लहर को रोकना चुनौती रहेगा।

कुल मिलाकर भिलाई-चरोदा नगर निगम का आगामी चुनाव बेहद रोचक और कांटे की टक्कर वाला होने के संकेत दे रहा है। आने वाले दिनों में जैसे-जैसे प्रत्याशियों के नाम तय होंगे, वैसे-वैसे राजनीतिक समीकरण भी तेजी से बदल सकते हैं। फिलहाल दोनों दलों के नेताओं की नजर संगठन की रणनीति और जनता के मूड पर टिकी हुई है, क्योंकि इस बार महापौर की कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता पहले की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि भिलाई-चरोदा नगर निगम चुनाव इस बार साधारण नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा की सीधी लड़ाई बनने जा रहा है। एक ओर भाजपा में टिकट की होड़ चुनाव से पहले ही सियासी तापमान बढ़ा रही है, तो दूसरी ओर कांग्रेस को अपने विकास कार्यों की कसौटी पर जनता के बीच उतरना होगा। अब नजर इस बात पर है कि दोनों दल किस चेहरे पर दांव लगाते हैं और आखिरकार नगर की जनता सत्ता की चाबी किसके हाथ सौंपती है।