कौन सा जल है जो चित्त के बर्तन को साफ करेगा? “ओशो”

 कौन सा जल है जो चित्त के बर्तन को साफ करेगा? “ओशो”

ओशो: मैं आपको कहूं, मौन, मौन चित्त को साफ करता है। जो जितना ज्यादा मौन में प्रविष्ट होता है उतना उसके चित्त का बर्तन साफ हो जाता है। मौन के जल से चित्त के बर्तन धोए जाते हैं। लेकिन हम मौन रहना भूल गए हैं। हम एकदम बोले जा रहे हैं, दूसरों से या अपने से। हम चैबीस घंटे बातचीत में लगे हुए हैं, अपने से या दूसरों से। सोते समय भी हम बातचीत करते हुए सोते हैं, उठते ही हम फिर बातचीत में लग जाते हैं। हम बातों से घिरे हुए हैं। मौन हम भूल गए हैं।इस संसार में अगर कोई चीज खो गई है, तो मौन खो गया है। और जहां मौन खो जाएगा, वहां जीवन में जो भी श्रेष्ठ है वह सब खो जाएगा। क्योंकि सब श्रेष्ठ मौन से जन्मता है, वह साइलेंस से पैदा होता है।

रात को सोते वक्त घड़ी भर को बिलकुल साइलेंस में उतर जाएं, बिलकुल चुप हो जाएं, सब तरह से मौन हो जाएं। सुबह उठते वक्त सब भांति मौन होकर थोड़ी देर पड़े रहें और फिर उठें। और दिन में भी चैबीस घंटे यह खयाल रहे कि जहां तक बन पड़े, मेरे भीतर मौन हो। जो अति आवश्यक है वह बोला जाए; जो अति आवश्यक है वह सोचा जाए; अन्यथा मेरे भीतर मौन हो। और अगर कोई सजग होकर इसका स्मरण रखे कि मेरे भीतर मौन हो, तो धीरे-धीरे मौन का अवतरण शुरू हो जाता है। अगर रास्ते पर चलते वक्त आप यह खयाल रखें कि मैं मौन चलूं। पहले तकलीफ होगी। जीवन भर की आदत है। शायद अनेक जीवन की आदत है। लेकिन धीरे-धीरे स्मरणपूर्वक अगर भोजन करते वक्त स्मरण रखें कि मैं मौन रहूं।मौन का यह अर्थ नहीं कि ओंठ बंद हों। मौन का अर्थ है, भीतर मन का चलन-हलन बंद हो, भीतर वहां चुप्पी हो। जब भी मौका मिले मौन हो जाएं। जिस क्षण आप मौन में हैं उसी क्षण आप मंदिर में हैं। चाहे फिर वह दुकान हो, चाहे फिर वह बाजार हो, चाहे वह दफ्तर हो। जीवन का अधिकतम क्षण मौन में व्यतीत हो, इसका स्मरण रखें। और आप क्रमशः एक नये आदमी को अपने भीतर आते हुए अनुभव करेंगे। क्रमशः आपके भीतर एक नये मनुष्य का जन्म होने लगेगा। आप बिलकुल नई चेतना को अनुभव करेंगे। और आपके भीतर जड़ता टूटनी शुरू हो जाएगी। एक समय आएगा आपके भीतर कोई जड़ता नहीं होगी और केवल चैतन्य रह जाएगा। जिस क्षण व्यक्ति पूर्ण मौन में स्थापित अपनी चेतना को प्रवेश करता है उसी क्षण उसके भीतर शरीर विलीन हो जाता है और केवल आत्मा का अनुभव शेष रह जाता है।जिस क्षण आप पूरे मौन में हैं उसी क्षण आप संसार में नहीं हैं परमात्मा में हैं। इसको मैं संन्यास कहता हूं। ऐसा व्यक्ति जो सारी भीड़ के बीच मौन है, संन्यासी है; ऐसा व्यक्ति जो सारे कामों के बीच मौन है, संन्यासी है; ऐसा व्यक्ति जो सब करते हुए मौन है, संन्यासी है। जिसके भीतर मौन है वह संन्यास को पा गया। क्योंकि मौन ही द्वार खोलता है परमात्मा के। मौन ही द्वार खोलता है अनंत चेतना के। मौन ही द्वार खोलता है पदार्थ के पार जो है उसके लिए। स्मरण रखें, जो भी साधने जैसी बात है, जो भी पाने जैसी बात है, जो भी उपलब्ध करने जैसी बात है, वह है साइलेंस, वह है मौन।

संसार चैबीस घंटे आपके भीतर मौन को तोड़ रहा है। आप खुद चैबीस घंटे अपने मौन को तोड़ रहे हैं। फिर चाहे आप शास्त्र पढ़ें, ग्रंथों को याद करें, तत्वज्ञान को स्मरण कर लें, वह भी सब आपके मौन को तोड़ रहा है। उससे भी आप मौन में नहीं जा रहे हैं। वह सब तत्वज्ञान भी आपके भीतर बातचीत बन रहा है।चुप हो जाएं। इससे बेहतर और कुछ भी नहीं है। और चुप्पी को अनुभव करें अपने भीतर। और उस घड़ी में जब आपके भीतर कोई भी नहीं बोलता होगा, जब निबिड़ सन्नाटा होगा, जैसे कोई दूर एकांत में, वन में सब शांत हो, कोई पक्षी भी न बोलता हो, वैसा जब निबिड़ सन्नाटा आपके भीतर होगा, तो आप अनुभव करेंगे, आप सामान्य व्यक्ति नहीं हैं, आप देह के घेरे में बंधे हुए व्यक्ति नहीं हैं, आपकी चेतना तब आकाश को छूने की सामर्थ्य को उपलब्ध हो जाती है। उस मौन में आपको दिखाई पड़ता है, अनुभव होता है, सुनाई पड़ता है, वह जो परमात्मा का है। इस मौन को ही मैं प्रार्थना कहता हूं, इस मौन को ही ध्यान कहता हूं, इस मौन को ही समाधि कहता हूं।

और इसे साधने के लिए किसी के पास सीखने जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि जो भी आप सीखेंगे वह आपके भीतर बातचीत बन जाएगा। इसे साधने के लिए किन्हीं ग्रंथों को पढ़ने की जरूरत नहीं है, और इसे साधने के लिए किन्हीं पहाड़ों पर जाने की जरूरत नहीं है, जहां हैं वहां ही स्मरणपूर्वक इतना ही ध्यान रखें कि मेरे भीतर व्यर्थ की बातचीत न चले। और जब भी व्यर्थ की बातचीत चले तब शांत होकर उसे देखें और कुछ न करें। और आप हैरान होंगे, अगर आप अपने भीतर चलती हुई बकवास को शांत होकर देखें तो आपके भीतर एक नये तत्व का अनुभव होगा, जो केवल देख रहा है। बातचीत चल रही है और वह दूर खड़ा है। और तब आपको यह अनुभव होगा कि चित्त बातचीत में लगा हुआ है लेकिन आत्मा अभी भी मौन है और शांत है।वह जो देखने वाला तत्व है वह आपकी आत्मा है। वह निरंतर मौन में और निरंतर साइलेंस में है। उसका थोड़ा सा अनुभव जैसे-जैसे गहरा होगा, बातचीत गिरती जाएगी, बातचीत विलीन होती जाएगी, एक समय आएगा आपके भीतर कुछ भी विचार चलते हुए नहीं रह जाएंगे। और जब कोई विचार नहीं चलते हैं तो विचारशक्ति का जन्म होता है। और जब तक विचार चलते हैं तब तक विचारशक्ति का जन्म नहीं होता। जितने ज्यादा विचार हो जाएंगे, आप उतने ज्यादा विक्षिप्त हो जाएंगे। पागल के विचार ही विचार रह जाते हैं, विवेक बिलकुल नहीं रह जाता। इसलिए दुनिया के बहुत बड़े-बड़े विचारक पागल होते देखे जाते हैं, वह इस बात का सबूत है कि विचारक सत्य को अनुभव नहीं कर सकता। और आज तक दुनिया में किसी विचारक ने सत्य को अनुभव नहीं किया है और न कभी कर सकेगा।

जब हम बुद्ध को, महावीर को विचारक कहते हैं तो हम गलती करते हैं। ये विचारक नहीं हैं। इन्होंने तो विचार को छोड़ दिया है। ये तो सब विचार को छोड़ कर चुप हो गए हैं। ये द्रष्टा हैं। और जो द्रष्टा हो जाता है वह सब पा लेता है।
एक छोटी सी कहानी, अपनी चर्चा को मैं पूरा करूंगा।
उपनिषदों के समय में एक युवक सत्य की तलाश में गया। उसने अपने गुरु के चरणों में सिर रखा और उसने कहा कि मैं सत्य को पाने आया हूं। उसके गुरु ने कहाः सत्य को पाना चाहते हो या सत्य के संबंध में कुछ पाना चाहते हो? उसके गुरु ने कहाः सत्य को जानना चाहते हो या सत्य के संबंध में कुछ जानना चाहते हो? अगर सत्य के संबंध में कुछ जानना है तो फिर मेरे पास रुक जाओ और अगर सत्य को जानना है तो फिर मामला कठिन है। उस युवक ने कहाः मैं सत्य को जानने आया, संबंध में जानने को नहीं आया। संबंध में ही जानना होता तो मेरे पिता खुद बड़े पंडित थे। सभी शास्त्र वे जानते हैं। लेकिन जब मैंने उनसे कहा कि मैं सत्य को जानना चाहता हूं। तो उन्होंने कहाः मैं असमर्थ हूं, तू कहीं और खोज। मैं सत्य के संबंध में जानता हूं, मैं शास्त्रविद हूं, मुझे सत्य का कोई पता नहीं। तो मैं सत्य को ही जानने आया हूं।

उसके गुरु ने कहाः तब ऐसा करो, इस आश्रम में जितने गाय-बैल हैं, कोई चार सौ के करीब हैं, इन सबको ले जाओ। दूर ऐसे जंगल में चले जाना जहां कोई आदमी न हो। और जब ये गाय-बैल हजार हो जाएं–इनके बच्चे होंगे और ये हजार हो जाएंगे, तब तुम लौट आना। और तब तक एक शर्त याद रखो, जो भी बात करनी हो, इन्हीं गाय-बैलों से कर लेना। जो भी बात करनी हो, इनसे ही कर लेना, किसी आदमी से मत बोलना। जो भी तुम्हारे दिल में आए, इन्हीं से कह लेना। और इतनी दूर चले जाना कि कोई आदमी न हो। और जब ये हजार हो जाएं तो वापस लौट आना।

वह युवक उन चार सौ गाय-बैलों को खदेड़ कर जंगल में गया। दूर से दूर गया जहां कोई भी नहीं था। तो वहां वे जानवर और वह अकेला रह गया। उनसे ही बात करनी पड़ती। जो भी कहना होता, उन्हीं से कहना होता। उनसे क्या कहता? उनसे क्या बात करता? उनकी आंखों में तो कोई विचार न थे। गाय की आंख कभी देखी है? जब आपकी भी आंख वैसी हो जाए तो समझना कि कहीं पहुंच गए। उस आंख में कोई विचार नहीं है, खाली और शून्य। उन आंखों में देखता, उन्हीं के पास रहता, उन्हीं को चराता, पानी पिलाता, अकेला उन्हीं के बीच सो जाता। वर्ष आए और गए। कुछ दिन तक पुरानी घर की स्मृतियां चलती रहीं। लेकिन नया भोजन न मिले तो पुरानी स्मृतियां मर जाती हैं। हम रोज नई स्मृतियों को भोजन दे देते हैं, इसलिए रिप्लेस होती चली जाती हैं। पुरानी मरती हैं नई भीतर पहुंच जाती हैं। अब नये का तो कोई कारण नहीं था। गाय-बैल थे, उनके बीच रहना था। कोई नई स्मृति का कारण न था। नई स्मृतियां पैदा न हुईं, पुराने को भोजन न मिला, वे क्रमशः मरती गईं। वह गाय-बैल के पास रहते-रहते खुद गाय-बैल हो गया। वह तो संख्या ही भूल गया। गुरु ने कहा था, हजार जब हो जाएं तो इनको लिवा लाना। लेकिन वह तो भूल ही गया कि हजार कब हुईं वे।

बड़ी मीठी कहानी है। उन गायों ने कहा कि हम हजार हो गए, वापस लौट चलो। यह तो काल्पनिक ही होगा। लेकिन मतलब केवल इतना है कि उसे पता नहीं था कि कब गाय-बैल हजार हो गए। और जब गायों ने कहा, हम हजार हो गए, अब लौट चलो, तो वह वापस लौटा। गुरु ने दूर से देखा, वह हजार गाय-बैल का झुंड आता था और उसने अपने शिष्यों को कहाः देखो, एक हजार एक, एक हजार एक गाय-बैल आ रहे हैं। उसके शिष्य बोलेः एक हजार एक और बीच में वह जो युवा है? उसने कहाः उसकी आंखों में देखो। अब वह आदमी नहीं रहा। अब वह आदमी नहीं है। और जब वह करीब आया तो गुरु ने उसे गले लगा लिया और गुरु ने कहाः कहो मिल गया? वह युवक चुप रहा। उसने कहाः केवल आपके चरण छूने आया हूं। उसने गुरु के चरण छुए और वापस लौट गया। उस मौन में उसने जान लिया जो जानने जैसा था।

अब तक जो सदगुरु है वह मौन देता है और जो असदगुरु है वह शब्द देता है। जो सदगुरु है वह आपके ग्रंथ छीन लेता है, जो असदगुरु है वह आपको ग्रंथ दे देता है। जो सदगुरु है वह आपके विचार अलग कर लेता है, जो असदगुरु है वह आपके भीतर विचार डाल देता है। यही होता रहा है। और अगर सत्य को जानना हो–सत्य के संबंध में नहीं–तो मौन हो जाएं, चुप हो जाएं और चुप्पी को साधें, मौन को साधें।

हमने स्मरणपूर्वक नहीं साधा इसलिए नहीं साध पाए हैं। साधेंगे, निश्चित ही साधा जा सकता है। क्यों? क्योंकि विचार को साधना ही कठिन है, मौन तो हमारा स्वभाव है। अगर हमने थोड़ा सा भी प्रयास किया तो स्वभाव के झरने फूट पड़ेंगे, जड़ता टूट जाएगी, बह जाएगी और चैतन्य का प्रवाह हो जाएगा। और स्मरण रखें, जब चैतन्य का प्रवाह होता है तो सारा जीवन आमूल परिवर्तित हो जाता है। तब जो भी होता है वह शुभ है। तब कोई डिसिप्लिन, कोई अनुशासन ऊपर से नहीं लादना पड़ता, कोई चर्या ऊपर से नहीं लादनी पड़ती। जो भी होता है वह शुभ और सद्भाव होता है।

चैतन्य की धारा को जड़ता से न रोकें। जीवन ऐसा है कि वह जड़ कर रहा है। आपको प्रयास करना होगा कि जीवन की जड़ता आप पर आरोपित न हो। अगर आप इस प्रयास में संलग्न हैं तो आप एक धार्मिक आदमी हैं। हिंदू, मुसलमान, ईसाई होने से आप धार्मिक नहीं हैं। जड़ता के विरोध में अगर अपने भीतर लड़ रहे हैं तो आप धार्मिक हैं और चैतन्य की आशा में, अपेक्षा में और प्रार्थना में अगर संघर्षशील हैं तो धार्मिक हैं। ईश्वर करे, आपको धार्मिक बनाए। आप तथाकथित धर्मों से मुक्त हों और धार्मिक बनें। आप तथाकथित मंदिर, शिवालय और मस्जिदों से मुक्त हों और धार्मिक बनें। इस दुनिया में अगर धार्मिक आदमी का अवतरण हो जाए तो हम मनुष्य को बचाने में सफल हो जाएंगे। अन्यथा थोड़े ही दिनों में सारे मशीन, मशीनें ही मशीनें दिखाई पड़ेंगी, कोई आदमी कहीं दिखाई नहीं पड़ेगा। आदमी मर रहा है और मशीनें जीती जा रही हैं। धीरे-धीरे हम सब मशीनों की भांति हो जाएंगे। और यह सबसे बड़ी दुर्घटना होगी। एटम बम या हाइड्रोजन बम इतनी बड़ी दुर्घटनाएं नहीं हैं। अगर वे गिर जाएं तो कोई हर्जा नहीं है उतना। लेकिन अगर सारे मनुष्य जड़ मशीनों की भांति हो गए तो सब समाप्त हो जाएगा। प्रेम और सौंदर्य और सत्य और शुभ, सब विलीन हो जाएंगे। इन सबका जन्म चैतन्य के विकास से होता है।

जड़ता को न आने दें अपने भीतर और चैतन्य को विकसित करें। चैतन्य के विकास का नियम है–मौन को, शून्य को, ध्यान को, जागरूकता को अपने भीतर जो जितना विकसित करता है वह उतना मौन को उपलब्ध हो जाता है। परमात्मा आपके सब शब्द छीन ले, परमात्मा आपके सब विचार छीन ले, परमात्मा आपको निपट मौन कर दे, निरीह कर दे, आपको एकदम दरिद्र कर दे, आपकी आत्मा एकदम गरीब हो जाए विचारों से, तो आप एकदम समृद्ध हो जाएंगे और आपको अनंत संपत्ति के द्वार उपलब्ध हो जाएंगे। यही प्रार्थना करता हूं।

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३