स्वास्थ्य और अस्वास्थ्य ध्वनि की विशेष तरंगों पर निर्भर है इसलिए जाने पुराने मंदिर के निर्माण का आंतरिक अर्थ “ओशो”

 स्वास्थ्य और अस्वास्थ्य ध्वनि की विशेष तरंगों पर निर्भर है इसलिए जाने पुराने मंदिर के निर्माण का आंतरिक अर्थ “ओशो”

ओशो- अभी सिर्फ चालीस साल पहले काशी में एक साधु हुए हैं विशुद्धानन्द। सिर्फ ध्वनियों के विशेष आघात से किसी की भी मृत्यु हो सकती थी, ऐसे सैकड़ों प्रयोग विशुद्धानन्द ने करके दिखाए। वह साधु अपने बन्द मन्दिर के गुम्बज में बैठा था जो बिलकुल ‘अनहाईजीनिक’ था।पहली दफा तीन अंग्रेज डाक्टरों के सामने प्रयोग किया गया। वे तीनों अंग्रेज डाक्टर एक चिड़िया को लेकर अन्दर गए। विशुद्धानन्द ने कुछ ध्वनियां कीं, वह चिड़िया तड़फडायी और मर गयी। उन तीनों ने जांच कर ली कि वह मर गयी। तब विशुद्धानन्द ने दूसरी ध्वनियां कीं, वह चिड़िया तड़फड़ायी और जिन्दा हो गयी! तब पहली दफा शक पैदा हुआ कि ध्वनि के आघात का परिणाम हो सकता है! अभी हम दूसरे आघातों के परिणामों को मान लेते हैं क्योंकि उनको विज्ञान कहता है।हम कहते है कि विशेष किरण आपके शरीर पर पड़े तो विशेष परिणाम होंगे। विशेष औषधि आपके शरीर में डाली जाए तो विशेष परिणाम होंगे। विशेष रंग विशेष परिणाम लाते हैं। लेकिन विशेष ध्वनि क्यों नहीं? अभी तो कुछ प्रयोगशालाएं पश्‍चिम में, ध्वनियों का जीवन से क्या संबंध हो सकता है, इस पर बड़े काम में रत है।

दो तीन प्रयोगशालाओं में बड़े गहरे परिणाम हुए हैं। इतना तो बिलकुल साफ हो गया है कि विशेष ध्वनि का परिणाम, जिस मां की छाती से दूध नहीं निकल रहा है, उसकी छाती से दूध लाया जा सकता है। विशेष ध्वनि करने पर जो पौधा छह महीने में फूल देता है वह दो महीने में फूल दे सकता है। जो गाय जितना दूध देती है उससे दुगुना दे सकती है—विशेष ध्वनि पैदा की जाए तो।
आज रूस की डेअरीज में बिना ध्वनि के कोई गाय से दूध नहीं दुहा जा रहा है। और बहुत जल्दी कोई फल, कोई सब्जी बिना ध्वनि के पैदा नहीं होगी। क्योंकि प्रयोगशाला में तो यह सिद्ध हो गया है, अब व्यापक फैलाव की बात है। अगर फल, सब्जी, दूध और गाय ध्वनि से प्रभावित होते हैं, तो कोई कारण नहीं है कि आदमी प्रभावित न हो।स्वास्थ्य और अस्वास्थ्य ध्वनि की विशेष तरंगों पर निर्भर है। इसलिए तब बहुत गहरी ‘हाईजीनिक’ व्यवस्था थी जो हवा से बंधी हुई नहीं थी। सिर्फ हवा मिल जाने से ही कोई स्वास्थ्य आ जाने वाला है, ऐसी धारणा नहीं थी। नहीं तो यह असम्भव है, कि पांच हजार साल के लम्बे अनुभव में यह खयाल में न आ गया होता! हिन्दुस्तान का साधु बन्द गुफाओं में बैठा है जहां रोशनी नहीं जाती, हवा नहीं जाती। बन्द मंदिरों में बैठा है। छोटे दरवाजे हैं, जिनमें से झुककर अन्दर प्रवेश करना पड़ता है। कुछ मंदिरों में तो रेंगकर ही अन्दर प्रवेश करना पड़ता है। फिर भी स्वास्थ्य पर इसका कोई बुरा परिणाम कभी नहीं हुआ था।हजारों साल के अनुभव में कभी नहीं आया कि इनका स्वास्थ्य पर बुरा परिणाम हुआ है। पर जब पहली दफा संदेह उठा तो हमने अपने मंदिरों के दरवाजे बड़े कर लिए। खिड़कियां लगा दीं। हमने उनको ‘माडर्नाइज’ किया, बिना यह जाने हुए कि वह ‘माडर्नाइज’ होकर साधारण मकान हो जाते हैं। उनकी वह ‘रिसेटिविटी’ खो जाती है जिसके लिए वह कुंजी है।

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३

मैं कहता आंखन देखी–प्रवचन–5